आप सब 'पाखी' को बहुत प्यार करते हैं...

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बुधवार, मार्च 20, 2019

Save the Sparrow @ World Sparrow Day

आज विश्व गौरैया दिवस है।  एक दौर था, जब नन्ही गौरैया की चूं-चूं हर घर में सुनाई देती थी,पर अब यह प्यारी सी चिड़िया विलुप्त होने के कगार पर है। आज 'विश्व गौरैया दिवस' पर इस ओर सोचने की जरूरत है। कॉलर ट्यून में इसकी चहचहाहट सुनने की बजाय वास्तव में इसको जिन्दा रखिये। 


How can we save the sparrow?
Some small tips:
-Make arrangements in your own balcony or garden for the availability of food grains and water for sparrows.

-Try to minimize pollution as much as possible.

-Minimise the use of mobile phones, and use anti-radiation cover to protect yourself and the environment.

बुधवार, अक्टूबर 21, 2015

नवरात्र और बेटियाँ ...

नवरात्र हर साल आता है।  इस पर्व के बहाने बहुत सी बातें होती हैं, संकल्प उठाये जाते हैं।   इन नौ दिनों में हम मातृ शक्ति की आराधना करते। नवरात्र मातृ-शक्ति और नारी-सशक्तिकरण का प्रतीक है। आदिशक्ति को पूजने वाले भारत में नारी को शक्तिपुंज के रूप में माना जाता है। नारी सृजन की प्रतीक है. हमारे यहाँ साहित्य और कला में नारी के 'कोमल' रूप की कल्पना की गई है. कभी उसे 'कनक-कामिनी' तो कभी 'अबला' कहकर उसके रूपों को प्रकट किया गया है. पर आज की नारी इससे आगे है. वह न तो सिर्फ 'कनक-कामिनी' है और न ही 'अबला', इससे परे वह दुष्टों की संहारिणी भी बनकर उभरी है. यह अलग बात है कि समाज उसके इस रूप को नहीं पचा पता. वह उसे घर की छुई-मुई के रूप में ही देखना चाहता है. बेटियाँ कितनी भी प्रगति कर लें, पुरुषवादी समाज को संतोष नहीं होता. उसकी हर सफलता और ख़ुशी बेटों की सफलता और सम्मान पर ही टिकी होती है. तभी तो आज भी गर्भवती स्त्रियों को ' बेटा हो' का ही आशीर्वाद दिया जाता है. पता नहीं यह स्त्री-शक्ति के प्रति पुरुष-सत्तात्मक समाज का भय है या दकियानूसी सोच. 

नवरात्र पर देवियों की पूजा करने वाले समाज में यह अक्सर सुनने को मिलता है कि 'बेटा' न होने पर बहू की प्रताड़ना की गई. विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि बेटा-बेटी का पैदा होना पुरुष-शुक्राणु पर निर्भर करता है, न कि स्त्री के अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो बेटा या बेटी क़ी पैदाइश करती है. पर पुरुष-सत्तात्मक समाज अपनी कमजोरी छुपाने के लिए हमेशा सारा दोष स्त्रियों पर ही मढ़ देता है. ऐसे में सवाल उठाना वाजिब है क़ी आखिर आज भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से क्यों ग्रस्त है पुरुष मानसिकता ? कभी लड़कियों के जल्दी ब्याह क़ी बात, कभी उन्हें जींस-टॉप से दूर रहने क़ी सलाह, कभी रात्रि में बाहर न निकलने क़ी हिदायत, कभी सह-शिक्षा को दोष तो कभी मोबाईल या फेसबुक से दूर रहने क़ी सलाह....ऐसी एक नहीं हजार बिन-मांगी सलाहें हैं, जो समाज के आलमबरदार रोज सुनाते हैं. उन्हें दोष महिलाओं क़ी जीवन-शैली में दिखता है, वे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि दोष समाज की मानसिकता में है.

'नवरात्र' के दौरान अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा रही है. लोग उन्हें ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छानते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ?

समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहाँ महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....??



(मम्मी के ब्लॉग से साभार। यह पोस्ट अच्छी लगी, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

रविवार, अगस्त 24, 2014

मम्मी क्या होने वाला है?

आजकल हमारे प्राइम मिनिस्टर अंकल मोदी जी गंगा जी को स्वच्छ करने के लिए पहल किये हुए हैं।  इलाहाबाद और बनारस में तो हम अक्सर देखते हैं कि गंगा जी में ढेर सारी गन्दगी फैली हुई है।  सोचिये कि यदि गंगा जी और अन्य नदियों में हम ऐसे ही गन्दगी फैलाते रहेंगे तो फिर स्वच्छ और साफ़ पानी कहाँ से आएगा।  इस गंदे पानी से जो बीमारी फैलती है, वह तो कइयों की मौत का कारण भी बनती है।  जरूरत है कि हम सभी इस और अपनी तरफ से पहल करें और नदियों में गन्दगी न फैलाएँ। इसी सन्दर्भ में श्री उमेश चौहान अंकल जी ने एक सुंदर सी कविता भी 'पाखी की दुनिया' के लिए भेजी है।  आप सब इसे पढ़ें और सोचें -

मम्मी क्या होने वाला है?
गंगाजल कितना काला है?

तुम तो कहती उतर स्वर्ग से
शिव के केशों से गुजरी हैं,
ऊँचे हिम-नद का निर्मल जल
बाँहों में भरकर बहती हैं,
फिर हमने इसके पानी में
क्यों इतना कचरा डाला है? मम्मी क्या होने ……

छिड़क-छिड़ककर जिसके जल को
तुम देवों को नहलाती हो,
पूरे घर को पावन करती
अंत समय भी पिलवाती हो,
उसके जल की इस हालत पर
मेरा मन रोने वाला है। मम्मी क्या होने ……

गंगा ही क्यों सारी नदियों
को हमने गंदा कर डाला,
सूख गए गरमी के सोंते
भू-जल इतना खींच निकाला
कुँए, ताल सब सुखा दिए, अब
पीते जल बोतल वाला हैं। मम्मी क्या होने ……

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उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223).

जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)

शुक्रवार, अगस्त 15, 2014

प्राइम मिनिस्टर अंकल ने तो सोचा, अब आप सबकी बारी है !


स्वतंत्रता दिवस पर  प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा लालकिले से दिए गए भाषण को आज हमने भी सुना और देखा। उनकी एक बात हमें बहुत मार्मिक लगी। 

उन्होंने भ्रूण हत्या पर  बेहद तल्खी से कहा कि,  हमने हमारा लिंगानुपात देखा है...? समाज में यह असंतुलन कौन बना रहा है...? भगवान नहीं बना रहे...! मैं डॉक्टरों से अपील करता हूं कि वे अपनी तिजोरियां भरने के लिए किसी मां की कोख में पल रही बेटी को न मारें... बेटियों को मत मारो, यह 21वीं सदी के भारत के माथे पर कलंक है।

प्राइम मिनिस्टर अंकल ने तो सोचा, अब आप और सबकी बारी है ! सोच बदलो, देश बदलो !!

शनिवार, अगस्त 09, 2014

सोचिएगा : कन्या भ्रूण हत्या न रुकेगी, तो फिर राखी किससे बँधवाएंगे


कल रक्षाबंधन-फेस्टिवल है। इस दिन को हम खूब इंजॉय करते हैं। अपूर्वा और मैं एक दूसरे को खूब सारी राखियाँ बाँधते हैं और फिर मुँह मीठा तो होगा ही। फेस्टिवल का मौका हो और गिफ्ट्स न मिलें, भला ऐसे कैसे हो सकता है।

पर एक बात जरूर हमारे दिमाग में आती है कि लोग जिस तरह से कन्या भ्रूण हत्या करते हैं, उससे तो समाज से लड़कियाँ ही ख़त्म हो जाएंगीं। …फिर सोचिये भला की आपकी कलाई में प्यारी सी राखी कौन बाँधेगा। इसलिए इस बारे में भी अभी से सोचना आरम्भ कीजिए।   

और हाँ एक बात और, राखी की त्यौहार को सिर्फ भाई-बहन तक ही सीमित न कीजिए। इसे हर रिश्ते से जोड़िये।  बहन की रक्षा सिर्फ भाई ही नहीं करता,  बहनें भी तो करती हैं। पापा बता रहे थे कि सबसे पहली राखी इंद्र देव की पत्नी इंद्राणी ने उनकी रक्षा के लिए बाँधी थी। 

आप सभी लोगों को भी रक्षाबंधन-फेस्टिवल पर बधाइयाँ और आपका आशीर्वाद तो हमें मिलेगा ही। 

गुरुवार, अप्रैल 24, 2014

बच्चे, चुनाव और टॉफी

टाफी भला किसे नहीं अच्छी लगती।  हम बच्चों की  छोड़ भी दीजिये तो बड़ों के मुंह में भी पानी आ जाता है। 


अब  देखिये,इस चुनाव में बच्चों की टाफी तो चर्चा में है, पर बच्चों से जुड़े मुद्दे नहीं।




 क्या सिर्फ इसलिए कि बच्चे वोट नहीं दे सकते !!

शुक्रवार, मार्च 22, 2013

आप भी पानी बचाएं...

सोचिए, अगर हमारी जिंदगी में पानी नहीं होता तो। है न कठिन सवाल। पर जवाब तो देना ही पड़ेगा। बिना पानी के हम कैसे जीवित रहेंगें। हम जो भी खाते हैं, उन सबकी कुकिंग के लिए पानी बहुत जरुरी है। फिर दिन में कित्ता पानी हम पी जाते हैं। न पियो तो लगता है कि गला सूख जायेगा और फिर .....! पानी हम सबके लिए जरुरी है। पेड-पौधे और फूल भी तो तभी मुस्कुराते हैं, जब उन्हें पानी मिलता है। बिना पानी के तो वे भी सूखकर ख़त्म हो जाते हैं। इसीलिए तो हर साल 22 मार्च को 'विश्व जल दिवस' भी मनाया जाता है, ताकि हम इसके प्रति सचेत रहें !!
 
तो चलिए, हम लोग भी पानी को बचाने के लिए कदम उठाते हैं। वैसे मैं तो इसका विशेष ध्यान रखती हूँ। कितनी छोटी-छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम अपने जीवन में चाहें तो उपयोग कर पानी बचा सकते हैं। जैसे कि, मैं ब्रश करते समय पानी हर समय खुला नहीं रखती, नहाते समय भी ख्याल रखती हूँ कि पानी वेस्ट न हो। और पता है जब कभी हमारा वाटर टैंक ओवर फ्लो होने लगता है तो उसका सारा पानी बाहर गिरने की बजाय हमारे लान में जाता है, ताकि पानी बर्बाद न हो। ऐसी ही ढेर सारी छोटी-छोटी बातें हैं, जिनका ध्यान रखकर हम पानी बचा सकते हैं। मैं तो हर रोज ऐसे करती हूँ, आप क्या करते हैं......!!

शुक्रवार, मई 18, 2012

गंगा आरती देखी, पर गंगा जी में बिखरी गन्दगी का क्या ??

इस समय हमारी गर्मी की छुट्टियाँ चल रही हैं. इन छुट्टियों के बहाने खूब घूम-फिर भी रही हूँ. 15 -17 मई मैं बनारस घूमने गई. हमारे परिवार के लिए बनारस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. यहीं सारनाथ में ममा-पापा की सगाई और शादी हुई, तो अपूर्वा का जन्म भी यहीं हेरिटेज हास्पिटल में हुआ. एक लम्बे समय बाद आई तो बनारस में खूब घूमी. 5 मई की शाम मैं ममा-पापा और अपूर्वा के साथ गंगा जी घूमने गई. गंगा जी को इतने नजदीक से मैंने पहली बार देखा. वैसे गंगा जी तो इलाहबाद में भी हैं, पर दूर-दूर तक उनका पता भी नहीं चलता. यहाँ मैंने गंगा आरती भी देखी. मुझे तो यह देखकर बहुत अच्छा लगा. कित्ते सारे लोग जमा थे. गंगा-आरती देखने के लिए हम नाव से गए. इसी बहाने नौका-विहार का भी आनन्द लिया. गंगा जी के किनारे ढेर सारे घाट देखे. पर यहाँ का पानी तो बहुत गन्दा हो चुका है. जब हम अंडमान में थे तो पापा बताते थे कि यहीं बंगाल की खाड़ी में आकर गंगा जी मिलती हैं. वहाँ तो समुद्र का पानी कित्ता साफ था. पर बनारस में गंगा जी की दशा देखकर अच्छा नहीं लगा. पता नहीं जब तक मैं बड़ी हूंगी तो गंगा जी होंगी भी या नहीं. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम गंगा जी की आरती के साथ-साथ उनकी साफ-सफाई के बारे में भी सोचें.

बुधवार, अप्रैल 18, 2012

'बच्चों की दुनिया' को छोड़ गया आदित्य....

'आदित्य' एक दिन 'बच्चों की दुनिया' को छोड़कर यूँ ही चला जायेगा, किसी ने भी नहीं सोचा था. आदित्य तो हमेशा उर्जावान और प्रकाशमान रहता है, पर इस आदित्य को पता नहीं किसकी नजर लग गई कि वह 8 अप्रैल, 2012 को ना सिर्फ ब्लागिंग जगत बल्कि इस दुनिया को ही अलविदा कह गया. अभी 10 मार्च को तो उसने अपना जन्म-दिन सेलिब्रेट किया था. उसके ब्लॉग पर अंतिम पोस्ट पढ़ी तो बड़ा अजीब सा लगा, समझ में ही नहीं आया कि क्या कहूँ...भगवान जी ने भला उसे अपने पास क्यों इत्ती जल्दी क्यों बुला लिया...?? कहते हैं कि लोग भगवान जी के पास जाकर फिर से नए रूप में धरती पर आते हैं, पर उसमें आदित्य कौन होगा, यह भला कैसे पता चलेगा ??..आदित्य का जाना वाकई दुखद है..हमारी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि !!
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आदित्य के ब्लॉग की अंतिम पोस्ट : अलविदा दोस्तों..

बहुत दिनों बाद पुनः एक नई और अंतिम कहानी के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत हो रहा हूँ आशा है मैं आप सभी के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना पाऊँगा...



एक बहुत ही छोटा सा प्यारा सा बच्चा था ३ साल का. वह कभी भी मुसीबतों से घबराता नहीं था. हमेशा मुस्कराता हुआ उसका चेहरा सबको खुश कर देता था. वह अपने घर की एकमात्र संतान जो बिस्तर में ३ साल से था क्योंकि उसकी ब्रेन की दवाइयाँ चल रही थी. उन दवाइयों की वजह से और दिमाग में आने वाले झटकों के कारण वह पूरी तरह से विकसित नहीं हो पा रहा था. इसके बावजूद घर के सभी सदस्य आशा के साथ उसके स्वस्थ होने की उम्मीद में थे. सभी उससे बहुत बहुत प्यार करते थे।



नाना जी, दादा जी और बड़े पापा उसके सबसे प्यारे थे. मम्मी पापा का लाडला, नाना-नानी का दोस्त, बाकि बच्चों का दुलारा वह बच्चा ८ अप्रैल को अस्पताल जाते जाते रास्ते में ही अपना शरीर त्याग दिया. और सबको अकेला छोड़ वह दूसरी शरीर यात्रा के लिए निकल पड़ा.


उस प्यारे से छोटे बच्चे के परिजन उसके अगले शरीर यात्रा में सुन्दर और स्वस्थ शरीर की कामना करते हुए उसे आशीर्वाद दिए।



आप सभी से निवेदन है कि आप भी इस दिवंगत आत्मा के सुन्दर भविष्य के लिए प्रार्थना करें।



क्या आप जानना चाहोगे यह प्यारा बच्चा कौन है?
यह, मैं.... याने आदित्य... आपका प्यारा दोस्त हूँ.....
आप सभी से बिछुड़ते मुझे बहुत दुःख हो रहा है पर एक सुन्दर और स्वस्थ शरीर की कल्पना से मुझे आशा की एक किरण नज़र आ रही है.
एक ऐसा स्वस्थ शरीर मुझे चाहिए जिससे मैं इस सुन्दर सृष्टि के लिए और मानवता के लिए कार्य कर सकूँ.......



आप सभी ने मुझे बहुत सा प्यार और आशीर्वाद दिया उन सबके लिए मैं आप सभी का शुक्र गुजार हूँ.....



आप सभी स्वस्थ और प्रसन्न रहें इसी कामना के साथ आपका प्यारा आदित्य आप सभी से विदा लेता है।



अलविदा प्यारे दोस्तों!
आपका प्यारा, नन्हां आदित्य

रविवार, अप्रैल 08, 2012

ये रहा अक्षिता (पाखी) का सन-ग्लास

आजकल तो इलाहाबाद में खूब गर्मी पड़ रही है. कहाँ अंडमान का सुहाना मौसम और अब इलाहाबाद की गर्मी.एक तो सूरज दादा सबको परेशान किये हुए हैं, वहीँ सिविल लाइंस, जहाँ हमारा आवास है, बाहर निकलिए तो खूब सारे गड्ढे खुदे हुए हैं. इत्ती धूल उडती है कि अब आँखों का ख्याल तो करना ही पड़ेगा. इसीलिए मैंने भी एक खूबसूरत सन-ग्लास ले लिया है. अब देखती हूँ, सूरज दादा कैसे परेशान करते हैं या धूल कैसे मेरी आँखों में जाती है !!

(ये सारी फोटो हमारे आवास के लान की हैं )

गुरुवार, मार्च 22, 2012

विश्व जल दिवस : जल बचाएं

आज विश्व जल दिवस है. चलिए, आप सभी मेरे साथ संकल्प लें कि आज से और अभी से हम पानी को बर्बाद नहीं होने देंगें.
जल की हर बूंद हमारे जीवन और धरती के जीवन के लिए बहुत जरुरी है.

शुक्रवार, जनवरी 20, 2012

अंडमान में बन्दर नहीं पाए जाते...

आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि अंडमान में बन्दर नहीं पाए जाते. कानपुर में तो हमारे लान में खूब सारे बन्दर आते थे और पेड़ों और फूलों की डाली पर खेलते और उन्हें तोड़कर भाग जाते थे. जब मैं यहाँ अंडमान में नई-नई आई थी तो बंदरों को न देखकर सोचा कि किसी दूसरे आइलैंड पर रहते होंगें. पर यहाँ अंडमान में तो बन्दर पाए ही नहीं जाते. यहाँ जंगलों में सिर्फ जंगली सूअर और हिरन मिलते हैं. हाथी तो यहाँ मेन-लैंड से लाए गए हैं.
..पर निकोबार में बन्दर पाए जाते हैं. ये बन्दर निकोबार के लगभग अंतिम छोर कैम्पबेल-बे में पाए जाते हैं. पर ये बन्दर भी बड़े अजीब होते हैं. ये केकड़े (crab) खाते हैं. मैंने तो इन्हें देखा नहीं, पर सोचिये ये कैसे होते होंगें...!!

बुधवार, जनवरी 11, 2012

मेरा दाँत (tooth) खो गया...


आजकल मैं बहुत टेंशन में हूँ. मेरा एक मिल्की दाँत ( Milky tooth) कई दिनों से हिल रहा था. मैं भी उसे अपनी जीभ से खूब परेशान करती और सोचती थी कि यह कब बाहर निकलेगा ? मैं अपना दाँत हाथों में लेकर खुद देखना चाहती थी. पर सब गड़बड़ हो गया.

कल क्लास-रूम में टिफिन के बाद जब मैं पानी पी रही थी तो मुझे लगा कि मेरा दाँत नहीं है. मैं तो बहुत डर गई कि कहीं यह मेरे पेट में तो नहीं चला गया. ममा स्कूल में लेने आईं तो उन्हें बताया, फिर ममा ने फोन पर पापा को आफिस में बताया. अपने पहले ही मिल्की टूथ को मैं देख भी नहीं पाई और अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि वह दाँत कहाँ चला गया...??

रविवार, दिसंबर 04, 2011

देवानंद जी भगवान जी के पास चले गए..श्रद्धांजलि !! .

देवानंद साहब नहीं रहे. दादा जी बताते हैं कि वो उनके ज़माने के हीरो थे. पापा ने बताया कि देवानंद जी आरंभ में पत्रों की छंटाई का कार्य करते थे. फिर देखते-देखते हीरो बन गए. मैंने उन्हें तमाम चैनल्स पर देखा है, पर आज तक उनकी कोई मूवी नहीं देखी. मामा-पापा ने तो उनकी कुछेक फ़िल्में देखी हैं. अब मैं भी उनकी कोई फिल्म देखुन्गीं, तभी तो पता चलेगा कि लोग उन्हें सदाबहार-हीरो क्यों कहते थे..!


देवानंद जी भगवान जी के पास चले गए, पर अपनी फिल्मों से वे सदैव जिन्दा रहेंगें....श्रद्धांजलि !!

सोमवार, जुलाई 11, 2011

बेटियों को मारो नहीं...


आज विश्व जनसंख्या दिवस है. 2011 में तो मैं पहली बार जनसंख्या में शामिल हुई. मैं ही नहीं, 2001 के बाद पैदा सभी बच्चे पहली बार इस जनसंख्या में शामिल हुए. यह तो हम सभी के लिए ख़ुशी की बात है !

...पर इक दुःख की बात भी है कि बेटों कि अपेक्षा बेटियों की संख्या घटी है. इसलिए नहीं कि बेटियाँ पैदा ही नहीं हुईं, बल्कि इसलिए कि कई लोग बेटियों को पसंद नहीं करते और उन्हें पेट में ही मार डालते हैं. वे क्यों नहीं सोचते कि आखिर, हम बेटियों के बिना तो दुनिया सूनी है.

..इस 'विश्व जनसंख्या दिवस' पर यदि सब लोग यही संकल्प लें कि बेटियों को मारेंगें नहीं, तो ही इस दिन की सार्थकता है !!

सोमवार, अप्रैल 18, 2011

सूरज दादा तो खूब परेशान करते हैं..

अब गर्मी आ गई है. सूरज दादा तो खूब परेशान करने लगे हैं. यह तो बड़ी टेंशन की बात है.यह तो अच्छा है कि मेरा स्कूल सुबह से ही आरंभ होकर 11 बजे बंद हो जाता है. जब मैं स्कूल से आती हूँ तो उस समय तो बाहर खूब गर्मी पड़ रही होती है. अब छुटियाँ भी होने वाली हैं. फिर तो पूरे मई-जून माह घूमना ही घूमना है. तब तक तो बारिश भी हो जानी चाहिए, नहीं तो धूप में घूमने का मजा भी ख़राब हो जायेगा. बस दस दिन की पढाई, फिर दो महीने की लम्बी छुट्टी...!! मेरी इस ड्राइंग को भी तो देखिये. इसमें सूरज दादा दिख रहे हैं. एक पेड़ भी है और मेरा प्यारा रैबिट भी. मैंने अपनी भी तो पिक्चर बनाई है...देखा सब गर्मी से कित्ते परेशान हैं !!

मंगलवार, मार्च 22, 2011

आप भी पानी बचाइए...

आज विश्व जल दिवस है. मेरे चारों तरफ तो पानी ही पानी फैला है. पर वो पानी खरा है, इसलिए पी नहीं सकती.मैं सोच रही थी कि अगर पानी नहीं होगा तो फिर क्या होगा. है ना टेंशन की बात.


मैं बीच पर मस्ती कैसे करुँगी.


फिर बारिश में मैं कैसे खेलूँगी.


इन प्यारे-प्यारे फूलों को कैसे देखूंगी.


..इन प्यारी-प्यारी चिड़ियों का क्या होगा ?


यह सुरेन्द्र वर्मा अंकल जी का बनाया हुआ कार्टून देखिये, फिर तो पानी की महत्ता पता ही चल जाएगी.


अब आप भी जल्दी से पानी बचाने में लग जाइये...SAVE WATER !!

बुधवार, अगस्त 11, 2010

चिट्ठाजगत का गोलमाल : शिकायत किससे करूँ

आज तो चिट्ठाजगत जी ने मेरे साथ कमाल कर दिया. मेरी पोस्ट ही धडाधड टिप्पणियाँ से गायब कर दीं. पापा को बधाई वाली मेरी पोस्ट पर कुल 36 कमेंट्स हैं, पर धडाधड टिप्पणियाँ से यह पोस्ट ही गायब है, जबकि ममा वाले ब्लॉग शब्द-शिखर की 32 टिप्पणियाँ दिखाई जा रही हैं. फिर मैंने पापा का ब्लॉग 'शब्द सृजन की ओर' चिट्ठाजगत पर देखा तो उनकी पोस्ट पर 32 टिप्पणियाँ हैं, पर चिट्ठाजगत अभी तक 0 टिप्पणियाँ बता रहा है. फिर मैंने ममा के दूसरे ब्लॉग 'बाल-दुनिया' को देखा तो वहाँ 35 टिप्पणियाँ हैं, पर ये भी धडाधड टिप्पणियाँ से गायब है. कुछ तो गोल-मॉल है. आप भी अपना ब्लॉग देखें, शायद यह समस्या उसके साथ भी हो.

धड़ाधड़ टिप्पणियां
तेरा स्वागत है लड़की -सतीश सक्सेना [40]
बाल-गोपाल कृष्ण जी को जन्म-दिवस की बधाइयाँ [32]
उदयपुर का आमंत्रण देती कुछ तस्‍वीरें, आएंगे ना? [29]
सुनील गज्जाणी की तीन लघु कविताएँ [28]
बरसों से सोचती थी वो पल कभी तो आए, दिलकश [27]
प्रशासन और साहित्य के ध्वजवाहक : कृष्ण कुमार यादव [22]
खामोशियाँ [20]
यह कैसे पता किया जाए कि काटने वाला साँप ज़हरीला था अथवा नहीं? [19]
कश्मीर...! याद तो है ना? [18]
भीगी खामोशी [17]
दो पैसे की बातें! [17]
एक और भूली बिसरी ग़ज़ल [15]
The Soldier जाँबाज़ोँ को क्या मिलता है देश की सरकार से,बता रहे हैं सलमान खान Ayaz Ahmad [13]
आज डॉ टी एस दराल का जनमदिन है [13]
आज ब्लॉग4वार्ता की 150 वीं पोस्ट---ललित शर्मा [13]
तेरा हिज्र मेरा नसीब है... जब कब्बन मिर्ज़ा से गवाया खय्याम साहब और कमाल अमरोही ने [13]
मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा [12]
तू ही मुझे संवार दे [12]
वर्ष के श्रेष्ठ आदर्श ब्लोगर का अलंकरण [12]
ममतामई [11]
ज्योतिष और रोग [11]
इन्हें मिटाने की कोशिश में लोग हैं लेकिन, गरीब आज भी जिंदा हैं, दंग है दुनिया। -सर्वत जमाल [11]
टोनही मंत्र सिद्ध करने का दिन - हरेली [11]
इन सब बातो को कहने की ज़रूरत क्यूँ महसूस होती हैं ?? [11]
माँ हूँ ना मैं....... [11]
हाथों की कलाकारी...खुशदीप [11]
साँकलों के पीछे... [10]
ब्रिहदेश्वर मंदिर, तंजावूर [10]
मेरा हिंद !! मेरे ख़यालों की वादी है .... [10]
Ramazan जिस्म और रूह की बेहतरी है रोज़े में - Anwer Jamal [10]
आसमान पर चलना ....कैसा लगता है?? [9]
ग़ज़ल/ सारे तथाकथित.... [9]
कितने छेद हैं? [8]
दिन तो कट ही जाता है दुनियां के झमेले में .... [8]
१० अगस्त १९९१ ! [8]
आप लोग १२ अगस्त को क्या करने वाले हो ? ऑटो वाले का सवाल (12th August Meter Jaam) [8]
ये देखिये! मैं दिखाता हूँ, क़ुरआन की आयतों का सार! QURAAN AND ITS CONCLUSION [8]
पहियों पर दौडती जिंदगी .............अजय कुमार झा [7]
दो लफ़्ज़ों का फूल ........ [7]
आज की तरही में आ रही है लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल की जोड़ी ? नहीं नहीं नहीं सलीम जावेद की जोड़ी ? नहीं नहीं नहीं नीरज गोस्‍वामी जी और तिलकराज जी की जोड़ी । [7]





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पापा का जन्मदिन आया
1 दिन पूर्व पाखी की दुनिया... पर Akshita (Pakhi)
प्यारा-प्यारा दिन ये आया पापा का जन्मदिन लाया ढ़ेर सारी केक - मिठाई और खूब चाकलेट लाया। रंग-बिरंगे प्यारे-प्यारे सज गए गुब्बारे न्यारे मस्ती करूँ, धमाल करूँ गिफ्ट ...समाज
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....अब आप बताएं की इसकी शिकायत किससे करूँ. चिट्ठाजगत वाले अंकल जी तो लगता है मुझसे नाराज होकर बैठे हैं, तभी तो मेरे ब्लॉग की पोस्ट की टिप्पणियाँ नहीं दिखा रहे हैं.

मंगलवार, जून 01, 2010

अंडमान में आया भूकंप

आपको पता है आज रात 1: 28 के करीब अंडमान-निकोबार में भूकम्प आया। इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.6 मापी गई. इससे पहले 30 मार्च की रात 10:27 बजे के करीब डेढ़ मिनट भूकंप के झटके महसूस हुए थे. इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर पोर्टब्लेयर में 6.3 और मायाबंदर में 6.9 आंकी गई थी. उस समय जब भूकंप आया था तो अधिकतर भाग में बिजली नहीं थी और लोग सोने की तैयारी में थे. अचानक महसूस हुआ कि बेड, ए. सी. और खिड़कियाँ जोर-जोर से हिल रही हैं, चूँकि ईधर भूत-प्रेत की बातें उतनी प्रचलित नहीं हैं, सो उधर ध्यान ही नहीं गया. फिर लगा कि घर की पेंटिंग हो रही है और पीछे मजदूर सीढ़ी लगाकर छोड़ गए हैं. उसे ही कोई हिला रहा है. उस समय मैं बिस्तर पर खूब कूद रही थीं, सो एक बार यह भी दिमाग में आया कि बेड इसी के चलते हिल रहा है. अगले ही क्षण जब मम्मी-पापा ने बताया कि यह भूकम्प हो सकता है तो हम सब बेड पर एकदम बीचों-बीच में इस तरह बैठ गए कि कोई चीज गिरे भी तो हम लोगों के ऊपर न गिरे. लगभग डेढ़ मिनट तक हम लोग भूकम्प के हिचकोले खाते रहे. शरीर के रोंगटे खड़े हो गए थे. फिर शांत हुआ तो अन्य लोगों से फोन करके कन्फर्म किया कि वाकई ये भूकम्प ही था. क्योंकि यह हम लोगों का पहला भूकम्प-अनुभव था. फ़िलहाल बात आई और गई हो गई और हम लोग सो गए.

कल रात का भूकंप भी भयावह था. आधी रात्रि में सभी लोग सो रहे थे कि 1: 28 के करीब चीजें अचानक हिलने आरंभ हो गईं. कुछ लोगों को तो सोने में पता भी नहीं चला. मैं भी सो रही थी और मुझे भी पता नहीं चला. मम्मी की नींद अचानक खुल गई और उन्होंने पापा को भी जगाया. सुबह मुझे भी बताया. मम्मी-पापा सोच ही रहे थे कि बाहर निकलकर खुले में चला जाये तो सेफ होगा, पर इसी बीच भूकंप ख़त्म भी हो गया. मैं तो यह सब सोचकर ही डर गई, पर जब सब बीत जाता है तो कित्ता रोमांच पैदा होता है कि मानो झूला झूल रहे थे. सुबह जगकर चेक किया गया कि घर में कहीं दरार तो नहीं पड़ी, पर कुछ नहीं हुआ था. यहाँ तो घर भी ऐसे ही बनाये जाते हैं कि नुकसान न हो और भूकंप इत्यादि का उन पर प्रभाव न पड़े. सुबह टी. वी. पर देखा तो इस भूकंप तीव्रता 6.6 बताई जा रही थी. वैसे समुद्र के बीच में अवस्थित होने के कारण यहाँ भूकंप आम बात है और जल्दी कोई नुकसान भी नहीं होता. पर डर तो लगता ही है. अच्छा हुआ जो मैं मस्ती से सो रही थी, नहीं तो रात में कित्ता डर लगता !!
( और हाँ, सुबह-सुबह जगकर मैंने अपनी अल्मिरा, ट्वॉयज और सायकिल भी चेक की, कि सब सेफ तो हैं न. और अब हो रही है सायकिल पर टेडी-बियर को बिठाकर घुमाने की तैयारी)

गुरुवार, अप्रैल 22, 2010

विश्व पृथ्वी दिवस पर खूब पौधे लगायें

आपको पता है आज विश्व पृथ्वी दिवस है. आज स्कूल में टीचर ने भी बताया और कहा कि हमें पेड़-पौधों की रक्षा करनी चाहिए. पहले तो पेड़ काटो नहीं और यदि काटना ही पड़े तो एक की जगह दो पेड़ लगाना चाहिए।

पेड़-पौधे धरा के आभूषण हैं, उनसे ही पृथ्वी की शोभा बढती है। (इस वृक्ष पर लिखा है- पुरखों सी पेड़ों की छाया, शीतल कर दे जलती काया )


पहले जंगल होते थे तो खूब हरियाली होती, बारिश होती और सुन्दर लगता पर अब जल्दी बारिश भी नहीं होती, खूब गर्मी भी पड़ती है। (इस चित्र में फारेस्ट के मायने लिखे हुए हैं)। लगता है भगवान जी नाराज हो गए हैं. यह तो टेंशन वाली बात हुई ना। इसलिए आज सभी लोग संकल्प लेंगें कि कभी भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने चारों तरफ खूब सारे पौधे लगायेंगे और उनकी नियमित देख-रेख भी करेंगे !!




पुरखों सी पेड़ों की छाया,


शीतल कर दे जलती काया.


***विश्व पृथ्वी दिवस पर खूब पौधे लगायें और धरती को सुन्दर व स्वच्छ बनायें***


( इस पोस्ट की चर्चा झिलमिल करते सजे सितारे (चर्चा मंच-131) के अंतर्गत भी देखें )