आप सब 'पाखी' को बहुत प्यार करते हैं...

सोमवार, दिसंबर 26, 2011

सुनामी की याद और निकोबार की यात्रा

अंडमान में पिछले तीन दिनों से खूब बारिश और तूफानी हवाएं चल रही हैं. सभी द्वीपों पर जाने के लिए अधिकतर बोट, हेलीकाप्टर इत्यादि कैंसल हो गए हैं. इस सबके चक्कर में तो क्रिसमस का सारा मजा ही ख़राब हो गया. मेरी छुट्टियाँ हैं, पर कहीं घूमने भी नहीं जा पा रही हूँ.

..आपको पता है 26 दिसंबर 2004 को अंडमान-निकोबार में भयंकर सुनामी आई थी. आज उस घटना को सात साल पूरे हो गए हैं. यहाँ पोर्टब्लेयर के जिस मरीना पार्क में मैं खेलती हूँ, वह भी सुनामी में ध्वस्त हो गया था. अब तो नया पार्क बना है. ऐसे ही यहाँ बहुत सारी चीजें नष्ट हो गईं. पापा बता रहे थे कि सबसे ज्यादा नुकसान निकोबार में हुआ था. मैं तो अभी तक निकोबार नहीं गई हूँ, पर पापा दो बार घूम आए हैं.

पापा अभी 20 और 21 दिसंबर, 2011 को निकोबार गए थे. वहाँ से वे ढेर सारी तस्वीरें कैमरे में कैद करके लाए. आप भी देखिए-
सुनामी मेमोरियल, निकोबार के मुख्य गेट के समक्ष पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
सुनामी मेमोरियल, निकोबार के समक्ष पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
सुनामी मेमोरियल, निकोबार के अन्दर प्रदर्शित पट्टिका, जिस पर लिखा है कि आगामी पीढ़ियों को इस विभीषिका को कभी नहीं भूलना चाहिए.
सुनामी मेमोरियल, निकोबार के अन्दर प्रदर्शित पट्टिका, जिस पर उन लोगों के नाम दर्ज हैं, जो सुनामी की भेंट चढ़ गए. इस पर लगभग 700 लोगों के नाम अंकित हैं. इसमें मात्र उन्हीं लोगों के नाम शामिल हैं, जिनका मृत-शरीर पाया गया. जिनका मृत शरीर नहीं पाया गया, उनके बारे में यह पट्टिका मौन है.निकोबारी गाँव में एक निकोबारी-हट में लगी उन लोगों की नाम पट्टिका, जो सुनामी की विभीषिका में ख़त्म हो गए.उक्त नाम-पट्टिका के समक्ष बैठे वृद्ध निकोबारी से जानकारी लेने के बाद पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.निकोबारी गाँव में निकोबारी-हट के समक्ष पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
निकोबारी-हट के अन्दर पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
निकोबारी हट के समक्ष पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी. हर निकोबारी कबीले में ऐसी एक हट होती है, जिसे वे सामुदायिक-गृह के रूप में प्रयोग करते हैं. शादी-ब्याह, उत्सव के दौरान मेहमानों के ठहरने के लिए इसका उपयोग किया जाता है. यह दो मंजिला होती है.सुनामी से पहले बनी निकोबारी-झोपड़ियाँ, जो अब नष्टप्राय हो गई हैं. इसके बदले में प्रशासन ने निकोबरियों को नए घर उपलध कराए हैं.सुनामी पश्चात् निकोबरियों को सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए नए मकान.
सुनामी के दौरान पुरानी जेट्टी स्थित समुद्र तट के पास अवस्थित कई मकान इत्यादि ध्वस्त हो गए, पर मुरूगन देवता का यह मंदिर सलामत रहा. यही कारण है कि लोग इस मंदिर के प्रति काफी आस्था रखते हैं.
निकोबार में समुद्र तट के किनारे पड़ी, निकोबारी लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाती रहीं डोंगी (बोट). सुनामी के दौरान ये सब ख़राब हो गईं.सुनामी के दौरान निकोबार में काफी नुकसान हुआ. इसी दौरान एक जलयान (Ship) पानी में डूब गया. उसके अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं.निकोबार की पुरानी जेट्टी, जो सुनामी में नष्ट हो गई. अब यहाँ नई जेट्टी बनाने का कार्य चल रहा है.
सुनामी ने यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा और जैव विविधता को काफी नुकसान पहुँचाया. समुद्र के किनारे और जंगलों तक में नष्ट हो गई कोरल्स बिखरी पड़ी हैं.ऐसी ही कोरल्स के साथ पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी. अंडमान-निकोबार के समुद्र तट (Beach) अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के साथ-साथ मोतियों जैसे चमकते सफ़ेद बालू के लिए भी जाने जाते हैं. इनका आकर्षण ही कुछ अलग होता है.इस आकर्षण का लुत्फ़ उठाते पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
निकोबार में एक तट का रमणीक दृश्य.
निकोबार में नारियल वृक्षों का एक रमणीक दृश्य. निकोबारी नारियल-फल को इकठ्ठा कर मुख्य भूमि भेजते हैं और यह इनकी आय का प्रमुख स्रोत है.
निकोबार में मात्र दो जनजातियाँ पाई जाती हैं-निकोबारी और शौम्पेन. इनमें से निकोबारी अब सभ्य हो चुके हैं. वे बकायदा शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और तमाम रोजगारों में भी हैं. निकोबारी बालकों के साथ पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.दितीय विश्व-युद्ध के दौरान अंडमान-निकोबार पर जापानियों का कब्ज़ा रहा. उन्होंने शत्रु-राष्ट्रों से मुकाबले के लिए अंडमान-निकोबार की अवस्थिति के चलते इसे एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल किया. यहाँ पर अभी भी कई बंकर और तोपों के अवशेष देखे जा सकते हैं. ऐसी ही एक तोप के समक्ष खड़े पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.1942-45 के दौरान दितीय विश्व युद्ध के समय जापानियों का अंडमान-निकोबार पर कब्ज़ा रहा. इस दौरान उन्हें सबसे ज्यादा भय अंग्रेजी बोलने वालों और शिक्षित लोगों से था. ऐसे लोगों को वे अंग्रेजों का मुखबिर समझते थे. ऐसे तमाम लोगों को जापानियों ने न्रीशन्षता -पूर्वक मौत के घाट उतार दिया. सेंट थामस न्यू कैथेड्रल चर्च, मूस, कार निकोबार के समक्ष ऐसे लोगों की सूची, जिन्हें जापानियों ने ख़त्म कर दिया.
सेंट थामस न्यू कैथेड्रल चर्च, मूस, कार निकोबार के समक्ष बिशप डा. जान रिचर्डसन (1884- 3 जून 1978) की मूर्ति. बिशप डा. जान रिचर्डसन को निकोबरियों को सभ्य बनाने का श्रेय जाता है. भारत सरकार द्वारा पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित बिशप जान रिचर्डसन संसद हेतु अंडमान-निकोबार से प्रथम मनोनीत सांसद भी थे.सेंट थामस न्यू कैथेड्रल चर्च, मूस, कार निकोबार के समक्ष बिशप डा. जान रिचर्डसन (1884- 3 जून 1978) की समाधि.सेंट थामस न्यू कैथेड्रल चर्च, मूस, कार निकोबार में एक निकोबारी बालक और अपने मित्र के साथ पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.
कार-निकोबार में अवस्थित जान रिचर्डसन स्टेडियम. इसका उद्घाटन 15 अप्रैल, 1994 को तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री पी. वी. नरसिम्हा राव जी द्वारा किया गया था. अंडमान-निकोबार लोक निर्माण विभाग के अतिथि-गृह में पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.अंडमान-निकोबार लोक निर्माण विभाग के अतिथि-गृह के समक्ष पापा श्री कृष्ण कुमार यादव जी.कार-निकोबार में किमूस-नाला के ऊपर बने इस 180 फीट के वैली-ब्रिज का उद्घाटन दिसंबर माह में ही अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के मुख्य सचिव श्री शक्ति सिन्हा द्वारा किया गया है. इस पुल के बन जाने से आवागमन में काफी सुविधा उत्पन्न हो गई है.

...तो कैसी लगी यह निकोबार यात्रा. आप जब भी आइयेगा, निकोबार घूमने जरुर जाइएगा. निकोबार जाने के लिए जिला-उपायुक्त से विशेष पास लेने की जरुरत होती है. वहाँ होटल इत्यदि की सुविधा नगण्य ही मानें. पोर्टब्लेयर से हेलीकाप्टर द्वारा एक घंटे और शिप द्वारा कार-निकोबार पहुँचने में लगभग 15-18 घंटे लगते हैं.

रविवार, दिसंबर 25, 2011

आज सेंटा लायेगा ढेर सारे उपहार...हैप्पी क्रिसमस !!

आज तो चारों तरफ क्रिसमस की धूम है. चारों तरफ क्रिसमस-ट्री, लटके हुए खूबसूरत स्टार, जिंगल बेल कितने अच्छे लगते हैं. सेंटा-क्लाज तो मुझे बहुत प्यारा लगता है. मैं सोचती हूँ की वह इस साल मेरे लिए भी खूब गिफ्ट लेकर आए.

मेरे स्कूल की तो पहले से ही छुट्टियाँ हो चुकी हैं. यहाँ अंडमान में तो क्रिसमस का त्यौहार खूब धूम-धाम से मनाया जाता है. हमारे स्कूल में भी 20 दिसंबर को एक क्रिसमस फंक्शन हुआ, बड़ा मजा आया. इसमें हम सभी बच्चे कोई ना कोई रोल निभा रहे थे. मैं तो परी बनी थी.

मेरी छोटी बहन अपूर्वा भी 27 दिसंबर को 1 साल 2 माह माह की हो जाएगी. सो, छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ और मस्ती ही मस्ती।




!! आप सभी को क्रिसमस की बधाई और ढेर सारा प्यार !!

!!...हो सकता है सेंटा उपहार लेकर आपके घर भी पहुँच जाये, सो तैयार रहिएगा...!!

बुधवार, दिसंबर 21, 2011

स्कूल की छुट्टी..क्रिसमस की बधाइयाँ !!

आज से मेरे स्कूल की छुट्टियाँ आरंभ हो गई हैं. अब मेरा स्कूल क्रिसमस और नए साल के बाद 2 जनवरी को खुलेगा. तब तक तो मुझे खूब मस्ती करनी है, घूमना है.


स्कूल बंद होने से पहले हम सभी को क्रिसमस कार्ड बनाने का प्रोजेक्ट दिया गया. मेरा कार्ड सबसे सुन्दर था. इसे तो स्कूल के बोर्ड पर भी लगाया गया है. यह रहा मेरा क्रिसमस-कार्ड.



..तो कैसा लगा मेरा क्रिसमस-कार्ड.

!! आप सभी को 'क्रिसमस' और 'बड़ा-दिन' (25 दिसंबर) की अग्रिम बधाइयाँ !!

रविवार, दिसंबर 18, 2011

छम-छम नाचा मोर


आजकल स्कूल में ढेर सारी कविताएँ पढाई जाती हैं. घर पर आकर मैं उन्हें खूब गुनगुनाती हूँ. इसे आप भी मेरे साथ गुनगुनाइए-

नीले अम्बर पर फिर छाई
इक घटा घनघोर
ठंडी-ठंडी हवा चली
और छम-छम नाचा मोर !

देखके इतना सुन्दर पक्षी
मेरे मन में आया
वो भी कितना सुन्दर होगा
जिसने इसे बनाया !!

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

चिड़िया चूं-चूं करती है

आजकल मेरे स्कूल में ढेर सारी प्यारी-प्यारी कविताएँ पढाई जाती हैं. घर पर आकर मैं उन्हें खूब गुनगुनाती हूँ. इसे आप भी मेरे साथ गुनगुनाइए-

चिड़िया चूं-चूं करती है
पास जाओ तो डरती है
दिन में खाना खाती है
रात पड़े सो जाती है !!

रविवार, दिसंबर 04, 2011

देवानंद जी भगवान जी के पास चले गए..श्रद्धांजलि !! .

देवानंद साहब नहीं रहे. दादा जी बताते हैं कि वो उनके ज़माने के हीरो थे. पापा ने बताया कि देवानंद जी आरंभ में पत्रों की छंटाई का कार्य करते थे. फिर देखते-देखते हीरो बन गए. मैंने उन्हें तमाम चैनल्स पर देखा है, पर आज तक उनकी कोई मूवी नहीं देखी. मामा-पापा ने तो उनकी कुछेक फ़िल्में देखी हैं. अब मैं भी उनकी कोई फिल्म देखुन्गीं, तभी तो पता चलेगा कि लोग उन्हें सदाबहार-हीरो क्यों कहते थे..!


देवानंद जी भगवान जी के पास चले गए, पर अपनी फिल्मों से वे सदैव जिन्दा रहेंगें....श्रद्धांजलि !!

बुधवार, नवंबर 30, 2011

पाखी पहुंची पोर्टब्लेयर से कोलकाता और फिर लखनऊ

26 और 27 अक्तूबर को हमने पोर्टब्लेयर से कोलकाता और फिर कोलकाता से लखनऊ की यात्रा की. 26 को दीपावली थी और 27 को अपूर्वा का पहला जन्म-दिन. पापा तो अक्सर कोलकाता जाते रहते हैं, पर लगभग एक साल बाद हम लोग पोर्टब्लेयर से मेन-लैंड के लिए गए थे. बड़ा मजा आया...यादगार रूप में कुछ फोटोग्राफ्स ...!!

पोर्टब्लेयर एयरपोर्ट पर अक्षिता (पाखी)

कोलकाता से पोर्टब्लेयर : एयर इण्डिया के विमान में अपूर्वा की मस्ती.

कोलकाता से पोर्टब्लेयर : एयर इण्डिया के विमान में अक्षिता (पाखी)


कोलकाता से पोर्टब्लेयर : एयर इण्डिया के विमान में ममा और अपूर्वा.


कोलकाता एयरपोर्ट पर उतरने के बाद ममा और अपूर्वा

कोलकाता एयरपोर्ट पर लगेज के लिए ट्राली के साथ अक्षिता (पाखी)


कोलकाता एयरपोर्ट पर लगेज का इंतजार करती अक्षिता (पाखी)
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कोलकाता एयरपोर्ट पर लखनऊ के लिए जेट एयरवेज का इंतजार.
जेट एयरवेज के विमान में मस्ती

अपूर्वा : क्या स्टाइल है !


इट्स माई फेमिली...पापा कैमरे के उस तरफ.

अपूर्वा : जरा यहाँ भी घूम लूं.
लीजिये हम आ गए लखनऊ..!!

सोमवार, नवंबर 28, 2011

ममा-पापा की शादी की सालगिरह..


मेरे ममा-पापा सबसे प्यारे.
लगते देखो कितने न्यारे.

ममा-पापा की शादी (28 नवम्बर, 2004) की सातवीं सालगिरह पर मेरी और अपूर्वा की तरफ से ढेर सारा प्यार और बधाई ! कहीं आप बधाई देना भूल न जाइएगा.मैं तो चली अपनी पार्टी का इंतजाम करने...!!

शुक्रवार, नवंबर 25, 2011

यह जलेबी भी न...

जलेबी तो मुझे बहुत अच्छी लगती है. पर यहाँ अंडमान में जलेबी नहीं मिलती. दुकानदार से जलेबी मांगिये तो इमरती देते हैं. उन्हें जलेबी और इमरती का अंतर ही नहीं पता चलता.

...और जब से मैंने जलेबी बाई वाला गाना सुना है. तब से तो जलेबी को और मिस करने लगी हूँ.

इस बार दिवाली के बाद मैं ममा-पापा के साथ लखनऊ गई थी तो वहाँ करीब पंद्रह दिन रही. अलीगंज में राधेलाल मिष्ठान भंडार के यहाँ से रोज सुबह गरम-गरम जलेबी मंगवाती और खूब मजे लेकर खाती. ममा-पापा को तो अपने लिए अलग से मंगवाना पड़ता. वैसे ममा-पापा को जलेबी के साथ दही और कचौरी खूब भाती है.अपूर्वा (तान्या) तो दोनों तरफ हाथ साफ करती.

..अब फिर अंडमान आ गई हूँ. ममा से कई बार जलेबी की फरमाइश करती हूँ. अब मेरी फरमाइश पूरी हो रही है. आखिर, ममा गरम-गरम बढ़िया जलेबी बनाती है. अब तो अपूर्वा भी जलेबी खाने में मेरा साथ देने लगी है.

...तो आप भी जलेबी का लुत्फ़ उठाइए और मुंह में पानी आने से रोकिए...!!

मंगलवार, नवंबर 22, 2011

'पाखी की दुनिया' और बच्चों से जुड़े अन्य ब्लॉगों की चर्चा 'जनसंदेश टाइम्स' में...

हम बच्चों के ब्लाग और बच्चो से जुड़े ब्लॉगों की अनूठी चर्चा जाकिर अली 'रजनीश' अंकल जी ने लखनऊ से प्रकाशित दैनिक अख़बार 'जनसंदेश' के 16 नवम्बर, 2011 अंक में 'ब्लॉगवाणी' कालम में की है. इस के लिए जाकिर अंकल जी को ढेर सारा प्यार और धन्यवाद. आपने ब्लागिंग पर मुझे प्राप्त 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' की भी चर्चा की..अच्छा लगा. यह पोस्ट जाकिर अंकल जी के ब्लॉग 'मेरी दुनिया मेरे सपने' पर प्रकाशित है, जहाँ से इसे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. इससे पहले दैनिक हिंदुस्तान अख़बार ने भी हम बच्चों के ब्लाग के सम्बन्ध में लिखा था. आप भी पढ़ें और ब्लागिंग जगत में बढ़ते हम बच्चों को जानें-






भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था- ‘मैं हैरत में पड़ जाता हूँ कि किसी व्‍यक्ति या राष्‍ट्र का भविष्‍य जानने के लिए लोग तारों को देखते हैं। मैं ज्‍योतिष की गिनतियों में दिलचस्‍पी नहीं रखना। मुझे जब हिन्‍दुस्‍तान का भविष्‍य देखने की इच्‍छा होती है, तो बच्‍चों की आँखों और चेहरों को देखने की कोशिश करता हूँ। बच्‍चों के भाव मुझे भावी भारत की झलक दे जाते हैं।’

बच्‍चे सचमुच किसी भी राष्‍ट्र के भविष्‍य होते हैं। इसीलिए विद्वानों ने देश और समाज को संवारने के लिए बच्‍चों के वर्तमान को संवारने पर जोर दिया है। बच्‍चों के समुचित विकास के लिए जितना जरूरी यह है कि उन्‍हें जीने की बेहतर सुविधाएँ मिलें और उनकी शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबंध हो, उतना ही जरूरी है कि उनके मानसिक विकास पर भी ध्‍यान दिया जाए।‍

बच्चों की इसी मानसिक खुराक को दृष्टिगत रखते हुए जहाँ देश के अलग-अलग भागों से ‘नंदन’, ‘बालहंस’, ‘चकमक’, ‘बालवाटिका’, ‘नन्‍हे सम्राट’, ‘बाल भारती’, ‘बालवाणी’ जैसी बाल पत्रिकाएँ निकल रही हैं, वहीं इंटरनेट पर बच्‍चों की मानसिक आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए अनेक ब्‍लॉगों का नियमित प्रकाशन भी हो रहा है। ऐसे तमाम ब्‍लॉगों में ‘बाल उद्यान’ (http://baaludyan.hindyugm.com) का प्रमुख स्‍थान है। यह ब्‍लॉग इंटरनेट पर हिन्‍दी लेखन को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय संस्‍था ‘हिन्‍द युग्‍म’ का एक प्रयास है। इस ब्‍लॉग के संचालकों में जहाँ एक ओर तकनीक के महारथी शामिल हैं, वहीं बच्‍चों के लिए लिखने वाले बहुत से कवि, कहानीकार, पेंटर, गायक भी इससे जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि इस ब्‍लॉग की विषय सामग्री में जितनी विविधता देखने को मिलती है, उतनी और कहीं नहीं मिलती।

ऐसा ही एक अन्‍य ब्‍लॉग है ‘नन्‍हा मन’ (http://nanhaman.blogspot.com), जहाँ पर बाल साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं की मनोरंजक रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। कविता-कहानी के अतिरिक्‍त यहाँ एक ओर सैर-सपाटा जैसे घुमक्‍कड़ी का कॉलम है, तो दूसरी ओर पर्यावरण और बाघ बचाओ जैसे जनोपयोगी अभियानों से सम्‍बंधित प्रेरक सामग्री। इस ब्‍लॉग की संचालिका सीमा सचदेव ब्‍लॉग के उद्देश्‍यों के बारे में बताते हुए कहती हैं ‘हर मासूम चेहरे पर खुशी हमारा ध्येय है। बच्चों की हँसी, राष्ट्र की विजय है। हम सद्-विचारों को फैलाएँगे। नेता देश का, बच्चों को बनाएँगे।’ प्रसन्‍नता का विषय है कि इस अभियान से देश के कोने-कोने से लोग जुड़े हुए हैं। वे नियमित रूप से बच्‍चों के लिए उपयोगी सामग्री रच रहे हैं, देश के सुंदर भविष्‍य की कामना कर रहे हैं।

ऐसे ही दो अन्‍य रोचक और पठनीय ब्‍लॉग है, ‘नन्‍हे-मुन्‍ने’ (http://naneymuney.blogspot.com) और ‘बाल-संसार’ (http://balsansar.blogspot.com), जिनपर विविधतापूर्ण रोचक और पठनीय सामग्री उपलब्ध है। इनमें जहाँ ‘नन्‍हे मुन्‍ने’ उपरोक्‍त तमाम ब्‍लॉगों की तरह एक सामुहिक ब्‍लॉग है, वहीं ‘बाल संसार’ अजय विश्‍वास के व्‍यक्तिगत प्रयासों का नतीजा है। उन्‍होंने अपने अथक श्रम से इस ब्‍लॉग की जड़ों को सींचा है।

बच्‍चों से जुड़े तमाम ब्‍लॉगों की भीड़ में एक ऐसा ब्‍लॉग भी है, जो अपने पवित्र लक्ष्‍य के कारण विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। ‘नन्‍हे पंख’ (http://nanhenpankh.blogspot.com) नामक यह ब्‍लॉग अक्षम बच्‍चों के संघर्ष को समर्पित है। अमलेन्‍दु अस्‍थाना द्वारा संचालित यह ब्‍लॉग बताता है कि भारत में मानसिक रूप से विकलाँग बच्‍चों की संख्‍या तीन प्रतिशत है। लेकिन इस संख्‍या को देखते हुए देश में इसके लिए काम करने वाले लोग काफी कम हैं। ‘नन्‍हे पंख’ एक तरह का वैचारिक ब्‍लॉग है, जो मानसिक विकलाँग बच्‍चों की आवाज को पूरे दमखम से उठाता है और उनके सम्‍बंध में चेतना जगाने का कार्य करता है।

एक ओर जहाँ इन्‍टरनेट पर बच्‍चों के लिए रोचक, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक सामग्री से सुसज्जित ब्‍लॉगों की संख्‍या पिछले कुछ एक सालों में तेजी से बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर ऐसे ब्‍लॉग भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनमें अभिभावक अपने बच्‍चों की गतिविधियों पर केन्द्रित सामग्री का प्रकाशन करते हैं। ऐसे ही कुछ चर्चित ब्‍लॉग हैं: ‘आदित्‍य’ (http://aadityaranjan.blogspot.com), ‘पाखी की दुनिया’ (http://www.pakhi-akshita.blogspot.com), ‘लविज़ा’ (http://blog.laviza.com), ‘माधव’ (http://madhavrai.blogspot.com), ‘अक्षयाँशी’ (http://riddhisingh.blogspot.com), ‘जादू’ व (http://jadoojee.blogspot.com), ‘नन्‍ही परी’ (http://nanhi-pari.blogspot.com)। ये तमाम ब्‍लॉग एक तरह से बचपन की ऑनलाइन डायरी के समान हैं, जहाँ पर बच्‍चों की गतिविधयाँ सचित्र रूप में दर्ज हो रही हैं। इनका एक लाभ जहाँ यह है कि अभिभावक अपने बच्‍चों की छोटी से छोटी गतिविधियों को भी ध्‍यान से निरख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे बच्‍चों में सकारात्‍मक भावनाएँ भरने के लिए प्राण-पण से लगे हुए हैं।

शायद यह इन्‍हीं सद्प्रयासों का परिणाम है कि ‘पाखी की दुनिया’ के द्वारा अपनी सकारात्‍मक गतिविधियों को ब्‍लॉग पर दर्ज करा रही नन्‍हीं ब्‍लॉगर अक्षिता (पाखी) को वर्ष 2011 के राष्‍ट्रीय बाल पुरस्‍कार के लिए चयनित किया गया है। ब्‍लॉगिंग के इतिहास में यह पहली घटना है, जब ब्‍लॉगिंग जैसे कार्य के लिए किसी को सरकारी पुरस्‍कार मिल रहा है। आने वाले दिनों में इससे नि:संदेह सकारात्‍मक ब्‍लॉगिंग को बढ़ावा मिलेगा और ब्‍लॉगों पर बच्‍चों से सम्‍बंधित सामग्री का प्रतिशत बढ़ेगा।



साभार : मेरी दुनिया मेरे सपने