आप सब 'पाखी' को बहुत प्यार करते हैं...

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मंगलवार, दिसंबर 25, 2018

Merry Christmas & New Year Celebration in Lucknow @ Akshitaa (Pakhi)

Merry Christmas & Happy New Year-2019 
क्रिसमस पर्व एवं नव वर्ष-2019 की हार्दिक शुभकामनायें।










Akshitaa (Pakhi) and Apurva with family, enjoying Merry Christmas & Happy New Year-2019 in Lucknow at Sahara Ganj Mall lucknow and  Fun Republic  Mall, Gomatinagar Lucknow.

बुधवार, दिसंबर 05, 2018

Lucknow Mahotsav @ Akshitaa (Pakhi) - Apurva

 Lucknow Mahotsav (Festival) is organized every year to showcase Uttar Pradesh Art and Culture and in particular Lucknavi ‘Tehzeeb’ so as to promote Tourism. It's a 10-day long celebration that is loaded with bright exhibitions, lavish nourishment, a few intriguing rivalries and a great deal of amusement.The Fascinating city of Lucknow has ever been associated with a rich tradition of hospitality, exotic cuisine and architectural grandeur. Lucknow attained unparalleled heights of excellence in art, craft and culture during the period of Nawabs. Lucknow Mahotsav is organized every year in the month of November / December to showcase the rich cultural heritage of Lucknow. This year, it is organized from 25th November 2018 to 05th December, 2018 at Smriti Upvan, Bangla Bazaar, Aashiyana, Lucknow.
Apurva enjoying the Lucknow Mahotsav with Chhota Bheem








 Akshitaa (Pakhi) and Apurva enjoying Dragon Train Ride with Mummy 




लखनऊ महोत्सव का आनन्द।
Enjoying Lucknow Mahotsav.

The year 1975-76 was observed and organized in South Asia as The Tourism Year. On this occasion in the motive to promote Lucknow’s Art, Culture and Tourism for national and international tourists, the decision to organize the Lucknow Festival was taken. During this period with exception to a few years, Lucknow Mahotsav has been organized every year.

Lucknow Mahotsav evening is being adorned with on one hand by the celebrities, famous artists’ performances and on the other by renounced classical singers. In this program the upcoming local artists have been provided a special representation on the cultural evenings. In addition, the national as well as local Poets/ Shayars have been provided due representation through Kavi Sammelan and Mushayara. 


गुरुवार, मई 19, 2016

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तक में 'नन्ही ब्लॉगर पाखी की ऊँची उड़ान'


(अक्षिता यादव उर्फ पाखी देश की सबसे छोटी हिन्दी ब्लॉगर के रूप में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से (मात्र चार साल आठ माह की उम्र में) सम्मानित हो चुकी हैं। दिल्ली के हिन्दी भवन में भी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में जब हिस्सा लेने गयी तो सभी ने उन्हें गोद में उठा लिया। यहाँ उन्हे “बेस्ट बेबी” ब्लॉगर का अवार्ड दिया गया। हिंदुस्तान टाइम्स वुमेन अवार्ड के लिए भी उन्हें नामांकित किया गया । अब तो जहाँ  भी ब्लॉगरों  का सम्मेलन होता है, तो पाखी को जरूर बुलाया जाता है। लखनऊ, काठमांडू और श्रीलंका में भी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में हो आईं। जब कुछ नया बनाती तो तत्काल अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देती हैं। पाखी बड़ी होकर आईएएस अफसर बनकर समाज और विशेषकर गरीबों की मदद करना चाहती हैं।) 


‘मेरा नाम अक्षिता है। मेरा निक नेम पाखी है। पाखी यानी पक्षी या चिड़िया। मैं भी तो एक चिड़िया हूँ जो दिन भर इधर-उधर फुदकती रहती हूँ। मेरा जन्म 25 मार्च 2007 को कानपुर में हुआ और फिलहाल मैं कक्षा चार  की विद्यार्थी हूँ ।'' . . . यह है “पाखी की दुनिया” की नन्ही ब्लॉगर अक्षिता यादव उर्फ पाखी के ब्लॉग की चंद लाइनें। पाखी देश की पहली सबसे कम उम्र की हिन्दी ब्लॉगर के रूप में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (2011) विजेता हैं। उन्हें यह पुरस्कार मात्र चार साल 8 माह की उम्र में महिला व बाल विकास मंत्रालय की तत्कालीन मंत्री कृष्णा तीरथ द्वारा प्रदान किया गया। इसी साल नयी दिल्ली के हिन्दी भवन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में “बेस्ट बेबी ब्लॉगर अवार्ड” से नवाजा गया। हिंदुस्तान टाइम्स वुमेन  अवार्ड (2013) के लिए भी उन्हें  नन्ही ब्लॉगर के रूप में अभिनेत्री शबाना आजमी, सांसद डिंपल यादव व संगीतकार साजिद द्वारा सम्मानित किया गया। लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन (2012) में विशेष रूप से सम्मानित किया गया। काठमांडू में आयोजित तृतीय अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में सबके आकर्षण का केन्द्र रहीं और वहाँ के पूर्व मंत्री व विधानसभा अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह ने सम्मानित किया। 

पाखी का जन्म कानपुर में हुआ। उस वक्त भारतीय डाक सेवा में अधिकारी उनके पिता कृष्ण कुमार यादव वहीं पोस्टेड  थे। माँ आकांक्षा और पापा अपने ब्लॉग में कुछ न कुछ पोस्ट किया करते थे। पाखी ने पूछा कि आप लोग मेरी पेंटिंग्स क्यों पोस्ट नहीं करते। पाखी की बात सबको जंच गयी। 24 जून 2009 को शुरू हुआ “पाखी की दुनिया” ब्लॉग। शुरू-शुरू में ड्राइंग अपलोड किया गया। पाखी की सृजनशीलता यहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने किस्से-कहानी लिखना शुरू किये। फिर कविताएं और विचार भी पोस्ट होने लगे। पिता ने कैमरा लाकर दिया तो पाखी के खींचे बेहतरीन चित्र भी ब्लॉग में जगह पाने लगे। विविधता लिए पाखी का ब्लॉग बेहद पसंद किये जाने लगा। देश की सीमाओ को लांघकर लगभग सौ देशों में 272 लोग नियमित फॉलोवर  बन गये। जब पाखी की पहुँच फेसबुक में हुई तो वहाँ तो 1,600 से ज्यादा लोग उनके पेज पर मित्र बन गये। गूगल प्लस में भी 240 फालोअर पाखी के ब्लॉग के पक्के पाठक बन गये। पाखी की इस सृजनशीलता और लोकप्रियता से प्रभावित होकर राजस्थान के मशहूर बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा ने अपनी बाल कविता की किताब “चूं-चूं” पर पाखी का चित्र ही लगा लिया। 

पाखी के ब्लॉग में उनके पारिवारिक ब्लॉग्ज़ शब्द शिखर, शब्द सृजन की ओर, डाकिया डाक लाया, सतरंगी प्रेम, बाल दुनिया, उत्सव के रंग, अपूर्वा के भी लिंक दिए हुए हैं।  अक्षिता के ब्लॉग में बेहद रोचक जानकारियां, कलाचित्र,फोटोग्राफ,कविताएं,संस्मरण, विचार, पत्र, यात्रा वृतांत, व स्कूल की गतिविधियों के अलावा परिवार में होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं भी निरंतर जगह पा रही हैं। पाखी के कुछ पोस्ट यथा “बेटियों को मारो नहीं”, ”ममा का जन्मदिन आया”, ”पाखी माने पंछी या चिड़िया” व अंडमान-निकोबार के 62वें वनमहोत्सव पर “पाखी का गुलाब”आदि पोस्ट सचमूच पठनीय हैं। 

पाखी की मम्मी आकांक्षा यादव बताती हैं कि पाखी बेहद शरारती है लेकिन उससे ज्यादा सृजनात्मक है। उसे पेंटिंग के अलावा फोटोग्राफी, कम्प्यूटर खेल, नृत्य व पढ़ना भाता है। वह हैप्पी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर में क्लास चार की छात्रा हैं। शाकाहारी पाखी को पनीर पुलाव, पनीर पराठे,पनीर पकोड़े व आइसक्रीम बेहद पसंद हैं। पाखी की  एक छोटी बहिन अपूर्वा भी हैं, जिनके साथ उनकी खूब छनती है। पाखी अंडमान-निकोबार को काफी याद करती हैं, जहाँ उन्होंने  काफी  मस्ती की और अपने ब्लॉग में शेयर भी किया। पाखी के पिता कृष्ण कुमार यादव बताते हैं कि पाखी जब मात्र तीन साल की थी तभी से मोबाइल, टेबलेट और लैपटॉप से दोस्ती कर ली थी। अगर देखा जाए तो आज बच्चों के खिलौने बदल गये हैं। 

पाखी बड़ी होकर आईएएस अफसर बनना चाहती हैं। पाखी को अपनी किताबें फेंकना या बेचना पसंद नहीं है।  वे अपनी किताबें, खिलौने और कपड़े जरूरतमंद को देना पसंद करती हैं। पाखी अपनी सामग्री अपने ब्लॉग (http://pakhi-akshita.blogspot.in) पर स्वयं अपलोड करती हैं। 

पुस्तक का नाम -   ‘. .और हमने कर दिखाया’ (देश के कुछ प्रतिभावान बच्चों की कहानियाँ )
संपादक - प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव
प्रकाशक - उतर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ 

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ  द्वारा प्रकाशित पुस्तक "...और हमने कर दिखाया" (देश के कुछ प्रतिभावान बच्चों की कहानियाँ, सम्पादन-प्रेमेंद्र श्रीवास्तव)  में अक्षिता (पाखी) पर भी 'नन्ही ब्लॉगर पाखी की ऊँची उड़ान" शीर्षक से एक अध्याय ...आभार !!

बुधवार, अक्टूबर 21, 2015

नवरात्र और बेटियाँ ...

नवरात्र हर साल आता है।  इस पर्व के बहाने बहुत सी बातें होती हैं, संकल्प उठाये जाते हैं।   इन नौ दिनों में हम मातृ शक्ति की आराधना करते। नवरात्र मातृ-शक्ति और नारी-सशक्तिकरण का प्रतीक है। आदिशक्ति को पूजने वाले भारत में नारी को शक्तिपुंज के रूप में माना जाता है। नारी सृजन की प्रतीक है. हमारे यहाँ साहित्य और कला में नारी के 'कोमल' रूप की कल्पना की गई है. कभी उसे 'कनक-कामिनी' तो कभी 'अबला' कहकर उसके रूपों को प्रकट किया गया है. पर आज की नारी इससे आगे है. वह न तो सिर्फ 'कनक-कामिनी' है और न ही 'अबला', इससे परे वह दुष्टों की संहारिणी भी बनकर उभरी है. यह अलग बात है कि समाज उसके इस रूप को नहीं पचा पता. वह उसे घर की छुई-मुई के रूप में ही देखना चाहता है. बेटियाँ कितनी भी प्रगति कर लें, पुरुषवादी समाज को संतोष नहीं होता. उसकी हर सफलता और ख़ुशी बेटों की सफलता और सम्मान पर ही टिकी होती है. तभी तो आज भी गर्भवती स्त्रियों को ' बेटा हो' का ही आशीर्वाद दिया जाता है. पता नहीं यह स्त्री-शक्ति के प्रति पुरुष-सत्तात्मक समाज का भय है या दकियानूसी सोच. 

नवरात्र पर देवियों की पूजा करने वाले समाज में यह अक्सर सुनने को मिलता है कि 'बेटा' न होने पर बहू की प्रताड़ना की गई. विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि बेटा-बेटी का पैदा होना पुरुष-शुक्राणु पर निर्भर करता है, न कि स्त्री के अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो बेटा या बेटी क़ी पैदाइश करती है. पर पुरुष-सत्तात्मक समाज अपनी कमजोरी छुपाने के लिए हमेशा सारा दोष स्त्रियों पर ही मढ़ देता है. ऐसे में सवाल उठाना वाजिब है क़ी आखिर आज भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से क्यों ग्रस्त है पुरुष मानसिकता ? कभी लड़कियों के जल्दी ब्याह क़ी बात, कभी उन्हें जींस-टॉप से दूर रहने क़ी सलाह, कभी रात्रि में बाहर न निकलने क़ी हिदायत, कभी सह-शिक्षा को दोष तो कभी मोबाईल या फेसबुक से दूर रहने क़ी सलाह....ऐसी एक नहीं हजार बिन-मांगी सलाहें हैं, जो समाज के आलमबरदार रोज सुनाते हैं. उन्हें दोष महिलाओं क़ी जीवन-शैली में दिखता है, वे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि दोष समाज की मानसिकता में है.

'नवरात्र' के दौरान अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा रही है. लोग उन्हें ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छानते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ?

समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहाँ महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....??



(मम्मी के ब्लॉग से साभार। यह पोस्ट अच्छी लगी, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

रविवार, अक्टूबर 26, 2014

हैप्पी बर्थ-डे टू अपूर्वा

हैप्पी बर्थ-डे टू अपूर्वा। 


हमारी प्यारी सिस्टर अपूर्वा 27 अक्टूबर को पूरे चार साल की हो जाएँगी। 


अपूर्वा सिर्फ हमारी सिस्टर ही नहीं बेस्ट फ्रेंड भी हैं।  एक -साथ तो हम दोनों खूब धमाल और मस्ती करते हैं। 





 अपूर्वा के  हैप्पी बर्थ-डे पर आप सबका आशीष, स्नेह और प्यार तो मिलना ही चाहिये !!

तुम जियो हजारों साल 
साल के दिन हों पचास हजार 



सोमवार, सितंबर 08, 2014

यदि डाक टिकट पर अपनी फोटो छपे तो …


सुनकर अच्छा लगता है कि डाक टिकट पर अपनी भी फोटो छपे। यदि आप  भी ऐसी इच्छा रखते हैं, तो अब यह पूरी हो सकती है। डाक टिकट पर अभी तक आपने गांँधी, नेहरू या ऐसे ही किसी महान विभूति की फोटो देखी होगी। पर अब डाक टिकट पर आप की फोटो भी हो सकती है और ऐसा संभव है डाक विभाग की ’’माई स्टैम्प’’ सेवा के तहत। 


वाराणसी प्रधान डाकघर में 6 सितम्बर, 2014 को माई स्टैम्प सेवा का उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में यह सेवा लखनऊ, आगरा व फतेहपुर सीकरी में उपलब्ध है और अब वाराणसी में। उन्होंने कहा कि माई स्टैम्प की थीम फिलहाल आकर्षक पर्यटन स्थलों पर आधारित रखी गई है। माई स्टैम्प फिलहाल 10 थीम के साथ उपलब्ध है, जिनमें-ग्रीटिंग्स, ताजमहल, लालकिला, कुतुब मीनार, हवा महल, मैसूर पैलेस, फेयरी क्वीन, पोर्ट ब्लेयर द्वीप, अजन्ता की गुफाएँं एवं सेंट फ्रांसिस चर्च शामिल हैं। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि माई स्टैम्प सेवा का लाभ उठाने के लिए एक फार्म भरकर उसके साथ अपनी फोटो और रूपय 300/-जमा करने होते हैं। एक शीट में कुल 12 डाक-टिकटों के साथ फोटो लगाई जा सकती है। इसके लिए आप अपनी अच्छी तस्वीर डाक विभाग को दे सकते हैं, जो उसे स्कैन करके आपकी खूबसूरत डाक-टिकट बना देगा। श्री यादव ने कहा कि यदि कोई तत्काल भी फोटो खिंचवाना चाहे तो उसके लिए भी प्रबंध किया गया है। पाँंच रुपए के डाक-टिकट, जिस पर आपकी तस्वीर होगी, वह देशभर में कहीं भी भेजी जा सकती है। इस पर सिर्फ जीवित व्यक्तियों की ही तस्वीर लगाई जा सकती है। 

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने इसके व्यावहारिक पहलुओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि किसी को उपहार देने का इससे नायब तरीका शायद ही हो। इसके लिए जेब भी ज्यादा नहीं ढीली करनी पड़ेगी, मात्र 300 रूपये में 12 डाक-टिकटों के साथ आपकी खूबसूरत तस्वीर। अब आप इसे चाहें अपने परिवारजनों को दें, मित्रों को या फिर अपने किसी करीबी को। यही नहीं अपनी राशि के अनुरूप भी डाक-टिकट पसंद कर उस पर अपनी फोटो लगवा सकते हैं। आप किसी से बेशुमार प्यार करते हैं, तो इस प्यार को बेशुमार दिखाने का भी मौका है। 
         
माई स्टैम्प स्कीम के आरंभ के बारे में बताते हुए निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दुनिया के कुछेक देशों में माई स्टैम्प  सुविधा पहले से ही लागू है, पर भारत में इसका प्रचलन नया है। वर्ष 2011 में नई दिल्ली में विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी (12-18 फरवरी 2011) के आयोजन के दौरान इसे औपचारिक रूप से लांच किया गया। उसके बाद इसे अन्य प्रमुख शहरों में भी जारी किया गया और लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। नतीजन देखते ही देखते हजारों लोगों ने डाक टिकटों के साथ अपनी तस्वीर लगाकर इसका लुत्फ उठाया। इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे अब वाराणसी में भी आरंभ किया जा रहा है।  



( पापा श्री कृष्ण कुमार जी के हवाले से विभिन्न अख़बारों में प्रकाशित यह रोचक खबर आप सभी की जानकारी के लिए शेयर कर रही हूँ।आशा है आपको पसंद आएगी) 

रविवार, मई 18, 2014

'Akshita (Pakhi) : पाखी की दुनिया' की फेसबुक पर लाइकिंग हजार के पार




हमारे फेसबुक  पेज (https://www.facebook.com/AkshitaaSingh) के प्रति आप सभी के प्यार, स्नेह, समर्थन और शुभकामनाओं के लिए आभार। आज इस पेज को लाइक करने वालों की संख्या 1, 000 से ऊपर पहुँच गई !!

Thanks for all Support, Likings n Blessings for our Facebook Page (https://www.facebook.com/AkshitaaSingh). Today this paje finally got more than 1,000 likes.


मंगलवार, जुलाई 30, 2013

दस दिनों के अंतराल में दो हैप्पी बर्थ-डे..










जुलाई और अगस्त के महीने हमारे लिए बेसब्री से इंतजार के होते हैं। दस दिनों के अंतराल में दो हैप्पी बर्थ-डे।  30 जुलाई को ममा का और 10 अगस्त को पापा का जन्म-दिन। वाह, यह तो हमारे लिए सबसे सुन्दर दिन होते हैं और मस्ती भरे भी। 


आज तो ममा का हैप्पी-बर्थ डे है। ममा को जन्मदिन पर ढेर सारी बधाइयाँ और प्यार। Many-Many happy returns of the day Mom. U r the best Mom.

पापा को जन्मदिन पर पहले से ही  ढेर सारी शुभकामनाएं और प्यार !!