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गुरुवार, जनवरी 24, 2019

राष्ट्रीय बालिका दिवस : सृष्टि की अनुपम भेंट हैं बेटियाँ


सृष्टि की अनुपम भेंट हैं बेटियाँ। वो हँसती हैं तो जिन्दगी बन जाती है।

('राष्ट्रीय बालिका दिवस' पर अमर उजाला में।)
(साभार : अमर उजाला, लखनऊ, 24 जनवरी 2019)





(Aksitaa (Pakhi) & Apurva in the office of father Mr. Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Lucknow HQ Region, Uttar Pradesh)




मंगलवार, मार्च 21, 2017

राजस्थान पत्रिका की पहल "बिटिया @ वर्क" : अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा भी पहुँचीं पापा के ऑफिस

राजस्थान पत्रिका की पहल "बिटिया @ वर्क"  के तहत 20 मार्च  बेटियों के लिए एक अलग ही एहसास लेकर आया। पत्रिका के बिटिया @ वर्क अभियान के तहत बड़ी संख्या में बेटियां अपने परिजनों के साथ उनके कार्यालय पहुंचीं, उन्होंने न सिर्फ अपने पापा या मम्मी के कार्यालय के काम-काज को समझा बल्कि उनकी कुर्सी पर बैठकर जिम्मेदारी भी संभाली। आज स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहीं बेटियों में से ही मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, कल्पना चावला, सानिया मिर्जा या इदिरा नूई जैसी हस्ती बनकर समाज में नई रोशनी बिखेरेंगी। इसी सद्भावना को ध्यान में रखकर पत्रिका समूह ने अपने संस्थापक श्रद्धेय कर्पूरचन्द्र कुलिश की जयंती पर 20 मार्च को अनूठा अभियान बिटिया @ वर्क आयोजित किया। इसके तहत देश-प्रदेश के कई शहरों में विभिन्न विभागों /संस्थानों/कम्पनियों के अधिकारी/कर्मचारी बेटियों को लेकर दफ्तर पहुंचे। 
इसी क्रम इसी में अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा भी अपने पापा श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के ऑफिस में पहुँचीं और उनके ऑफिस की कार्य-प्रणाली को नजदीक से देखा।
 पापा की कुर्सी पर बैठ लाड़ली ने जाना कामकाज, पापा ने बताए तरीके

अपूर्वा ने बताया कि उनको पापा की कुर्सी पर बैठकर बहुत अच्छा लगा।

मुझे पापा से मेहनत से काम करने की प्रेरणा मिली !


(साभार : राजस्थान पत्रिका, जोधपुर, 21 मार्च 2017)


रविवार, सितंबर 22, 2013

बेटियों के प्रति नजरिया बदलने की जरुरत (डाटर्स-डे पर विशेष)

आज डाटर्स डे है, यानि बेटियों का दिन. यह सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाया जाता है अर्थात इस साल यह 22  सितम्बर को मनाया जा रहा है. गौरतलब है कि चाईल्‍ड राइट्स एंड यू (क्राई) और यूनिसेफ ने वर्ष 2007 के सितंबर माह के चौथे रविवार यानी 23 सितंबर, 2007 को प्रथम बार 'डाटर्स-डे' मनाया था, तभी से इसे हर वर्ष मनाया जा रहा है. 

इस पर एक व्यापक बहस हो सकती है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस दिन का महत्त्व क्या है, पर जिस तरह से अपने देश में लिंगानुपात कम है या भ्रूण हत्या जैसी बातें अभी भी सुनकर मन सिहर जाता है, उस परिप्रेक्ष्य में जरुर इस दिन का प्रतीकात्मक महत्त्व हो सकता है. दुर्भाग्यवश हर ऐसे दिन को हम ग्रीटिंग्स-कार्ड, गिफ्ट और पार्टियों से जोड़कर देखते हैं. कार्पोरेट कंपनियों ने ऐसे दिनों का व्यवसायीकरण कर दिया है. बच्चे उनके माया-जाल में उलझते जा रहे हैं. डाटर्स डे की महत्ता तभी होगी, जब हम यह सुनिश्चित कर सकें कि-

१- बेटियों को इस धरा पर आने से पूर्व ही गर्भ में नहीं मारा जाना चाहिए। 

२- बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही खुशियाँ होंनी चाहिए, जितनी बेटों के जन्म पर।

३- बेटियों को घर में समान परिवेश, शिक्षा व व्यव्हार मिलना चाहिए. (ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी दोयम व्यवहार होता है)।

४- यह कहना कि बेटियां पराया धन होती हैं, उचित नहीं प्रतीत होता. आज के दौर में तो बेटे भी भी शादियों के बाद अपना अलग घर बसा लेते हैं।

५- बेटियों को दहेज़ के लिए प्रताड़ित करने या जिन्दा जलाने जैसी रोगी मानसिकता से समाज बाहर निकले।

६- बेटियां नुमाइश की चीज नहीं बल्कि घर-परिवार और जीवन के साथ-साथ राष्ट्र को संवारने वाली व्यक्तित्व हैं।

७-पिता की मृत्यु के बात पुत्र को ही अग्नि देने का अधिकार है, जैसी मान्यताएं बदलनी चाहियें. इधर कई लड़कियों ने आगे बढ़कर इस मान्यता के विपरीत शमशान तक जाकर सारे कार्य बखूबी किये हैं।

८-वंश पुत्रों से ही चलता है. ऐसी मान्यताओं का अब कोई आधार नहीं. लड़कियां अब माता-पिता की सम्पति में हक़दार हो चुकी हैं, फिर माता-पिता का उन पर हक़ क्यों नहीं. आखिरकार बेटियां भी तो आगे बढ़कर माता-पिता का नाम रोशन कर रही हैं.

....यह एक लम्बी सूची हो सकती है, जरुरत है इस विषय पर हम गंभीरता से सोचें की क्या बेटियों के बिना परिवार-समाज-देश का भविष्य है. बेटियों को मात्र बातों में दुर्गा-लक्ष्मी नहीं बनायें, बल्कि वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर उन्हें भी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का दर्ज़ा दें. बात-बात पर बेटियों की अस्मिता से खिलवाड़ समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक है. बेटियों को स्पेस दें, नहीं तो ये बेटियां अपना हक़ लेना भी जानती हैं. आज जीवन के हर क्षेत्र में बेटियों ने सफलता के परचम फैलाये हैं, पर देश के अधिकतर भागों में अभी भी उनके प्रति व्यवहार समान नहीं है. समाज में वो माहौल बनाना चाहिए जहाँ हर कोई नि: संकोच कह सके- अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ !!