ममा के साथ स्कूल जाना कित्ता अच्छा लगता है.
और स्कूल से आने के बाद आइस-क्रीम खाना ...
यमी-यमी...कित्ती स्वादिष्ट है. ममा आप भी लोगी क्या.


और ये आशू अंकल की तरफ से मेरा प्यारा सा चित्र..आपको भी पसंद आएगा .
मैंने चित्र बनाए सुंदर,
तोता लटका है बादल से,
गुड्डा मेरा हँसे जा रहा,
!! आप सभी लोगों ने मेरी ड्राइंग तो खूब देखी होगी पर आज मेरे बनाये गए चित्रों के साथ रावेन्द्र कुमार 'रवि' अंकल द्वारा 'सरस पायस' पर रचा गया नया शिशुगीत 'सूरज बन मुस्काऊँ' भी पढ़िए. तो ये रहा रवि अंकल का प्यारा सा शिशु-गीत और मेरे सुन्दर-सुन्दर चित्र. इसे पढ़कर जरुर बताइयेगा कि यह संयोजन कैसा रहा !!..और जब कोई निकलने को कहे तो उन्हें जीभ निकालकर चिढाना..
है ना मजेदार !!
हष्ट पुष्ट और ताकतवर हूँ
बीमारी मुझको न पकड़े
इसकी खातिर नित नियम से
दूध मुझे पिलवाते है।
शाम पार्क में मम्मी लाती
मुझको खूब घूमाती है
रात में जल्दी खाना खाते
फिर सोने ले जाती है।
सोने से पहले वो मुझको
रोज कहानी बतलाती
अच्छा जीवन क्या होता है
पाठ मुझे वो सिखलाती।
अब आप जरुर बताइयेगा कि ये कविता कैसी लगी आपको. और समीर अंकल को ढेर सारा प्यार !!
पोर्टब्लेयर स्थित यह साइंस सिटी कर्बिंस-कोव बीच के रास्ते में पड़ता है. शहर से इसकी दूरी मात्र 4 किलोमीटर है. समुद्र के किनारे थोड़ी ऊंचाई पर स्थित यह साइंस सेंटर भारत का छठवाँ साइंस सिटी सेंटर है. और हाँ, इसी 30 मई को इस साइंस सेंटर ने अपनी स्थापना के 7 वर्ष पूरे कर लिए.
समर वेकेशन में तो यहाँ बच्चे घूब घूमने आते हैं और तमाम क्रिएटिव कोर्सेज भी यहाँ चलते हैं.
अभी कुछ दिन पहले ही यहाँ 3-डी थियेटर भी आरंभ हुआ है.
यहाँ तो बायो टेक्नालाजी के बारे में जानकारी दी गई है. जब बड़ी हो जाऊँगी, फिर समझ में आयेगा.
अले, ये तो मैं सौरमंडल में पहुँच गई. कित्ता अच्छा लग रहा है यहाँ.
मिसाइल तो बढ़िया दिख रही है, एक फोटो यहाँ भी खिंचवा लेती हूँ.
यहाँ कुछ मजेदार एक्टिविटी दिख रही हैं.
अब जरा इस बाल को ट्राई करती हूँ.
अले वाह, यह कित्ता ऊँचा जा रहा है और फिर यहीं आकर गिरेगा.
इस ट्रेन को देखिये तो इसका कोई छोर ही नहीं पता चलता. इनके बीच तमाम शीशे लगे हुए हैं, जिसके चलते यह इत्ती बड़ी लगती है.
और इस नल से तो हमेशा पानी ही निकलता रहता है, पर टब कभी नहीं भरता.
अब मैं भी अपनी दोनों हथेलियाँ इस पर रखकर देखती हूँ कि सुई कहाँ तक पहुँची. यह शरीर के आवेश को मापती है.
जरा इसे भी तो ट्राई करूँ.
ये मेरे पीछे मनुष्य का ब्रेन बनाया गया है. इसे ध्यान से देखो तो समझ में आता है कि यह कैसे कार्य करता होगा.
चलते-चलते इसका भी आनंद ले लूँ .
आप भी पोर्टब्लेयर आयें, तो साइंस-सिटी जरुर घूमने जियेगा !!