आप सब 'पाखी' को बहुत प्यार करते हैं...
शनिवार, मार्च 26, 2016
शुक्रवार, मार्च 25, 2016
बुधवार, मार्च 23, 2016
मंगलवार, मार्च 08, 2016
राजस्थान पत्रिका में चर्चा : सबसे कम उम्र की ब्लॉगर अक्षिता
किसी ने सोचा नहीं होगा कि ब्लाॅगिंग या चिट्ठाकारी भी शोहरत और दौलत दिला सकती है, लेकिन अब ऐसा हकीकत में हो रहा है। केवल एक ब्लाॅग आपको ब्लाॅगिंग किंग या क्वीन बना सकता है। ब्लाॅगिंग में जहाँ पुरूष सक्रिय हैं, वही महिलाएं भी अब इसमें नाम व धन कमा रही हैं। महिलाएं कुकिंग, लाइफस्टाइल, इंटीरियर, फैशन, बाॅलीवुड, इंस्पिरेशनल आदि कई तरह के ब्लाॅग्स के जरिए प्रसिद्धि पा रही हैं और उन्होंने इसे कैरियर बना लिया है, जो उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा रहा है। आइए मिलते हैं कुछ ऐसी ही महिला ब्लाॅगर्स से.......
सबसे कम उम्र की ब्लाॅगर : अक्षिता यादव
25 मार्च 2007 को कानपुर में जन्मी पाखी यानी अक्षिता यादव भारत की सबसे कम उम्र की ब्लाॅगर के रूप में राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता का सम्मान पा चुकी हैं । अक्षिता की ब्लाॅगर मां ने 24 जून 2009 को पाखी की दुनिया (http://www.pakhi-akshita.blogspot.in) नाम से अक्षिता का ब्लाॅग बनाया। इस ब्लाॅग पर तमाम प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई और 100 से ज्यादा देशों में इसे देखा-पढ़ा जाता है। अक्षिता और उसका ब्लाॅग पाखी की दुनिया फेसबुक (https://www.facebook.com/AkshitaaSingh) पर भी उपलब्ध है।
ब्लाॅगिंग को दे रहीं नए मुकाम : आकांक्षा यादव
एक साहित्यकार और ब्लाॅगर है आकांक्षा । वह मूलतः उत्तर प्रदेश की हैं लेकिन राजस्थान से भी उनका नाता है। उन्हें हिन्दी में ब्लाॅग लिखने वाली शुरूआती महिलाओं में गिना जाता है। इनके ब्लाॅग को अब तक लाखों लागों ने पढ़ा है और करीब सौ से ज्यादा देशों में इन्हें देखा-पढ़ा जाता है। उनके ब्लाॅग 'शब्द-शिखर' (http://shabdshikhar.blogspot.com) को वर्ष 2015 में हिन्दी का सबसे लोकप्रिय ब्लाॅग चुना गया।
प्रस्तुति : मधुलिका सिंह
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(सबसे कम उम्र की ब्लॉगर : अक्षिता (पाखी) की चर्चा 'अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस' पर राजस्थान पत्रिका में 'मिलिए ब्लॉगिंग क्वीन्स से' के तहत....साथ में अक्षिता की मम्मी की भी चर्चा- "ब्लॉगिंग को दे रहीं नए मुकाम : आकांक्षा यादव".. ....आभार !!)
शनिवार, फ़रवरी 13, 2016
हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर में आयोजित प्रतियोगिताओं में अक्षिता ने हासिल किये सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट
अरे वाह! एक साथ इतने सारे सर्टिफिकेट्स पाकर अच्छा लग रहा है। अपने स्कूल में आयोजित हुए विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेना और फिर उपलब्धियों के रूप में उनमें स्थान प्राप्त करना वाकई सुखद एहसास देता है।
अक्षिता (पाखी) ने अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लिया और विभिन्न स्थान प्राप्त कर सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट हासिल किए।
अक्षिता की सिस्टर अपूर्वा ने भी प्रतियोगिताओं में भाग लेकर इंजॉय किया और सर्टिफिकेट हासिल किया।
अपूर्वा को अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित 'फ्रॉग रेस' कम्पटीशन में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।
Apurva secured Third position in 'FROG RACE' Competition in her Happy Hours school, Jodhpur, Rajasthan.
अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा अपने \सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट के साथ, अपने पापा श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के साथ।
अक्षिता (पाखी) को अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित 'कोलाज मेकिंग' प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।
Akshitaa (Pakhi) secured First position in 'COLLAGE MAKING' Competition in her Happy Hours School, Jodhpur, Rajasthan.
Akshitaa (Pakhi) secured Second position in 'TAG the PICTURE' Competition in her Happy Hours School, Jodhpur, Rajasthan.
अक्षिता (पाखी) को अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित 'टैग दि पिक्चर' कम्पटीशन में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ।
अक्षिता (पाखी) को अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित ''स्पेलोमेनिया" प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।
Akshitaa (Pakhi) secured Second position in 'SPELLOMANIA' Competition in her Happy Hours School, Jodhpur, Rajasthan.
अक्षिता (पाखी) को अपने स्कूल हैपी ऑवर्स स्कूल, जोधपुर-राजस्थान में आयोजित 'पिक्चर कम्पोजिशन ' प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।
Akshitaa (Pakhi) secured Third position in 'PICTURE COMPOSITION' Competition in her Happy Hours school, Jodhpur, Rajasthan.
अक्षिता (पाखी) अपने सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट के साथ।
लेबल:
जोधपुर में,
सम्मान-उपलब्धि,
स्कूल की बातें,
Apurva
शनिवार, जनवरी 09, 2016
विश्व पुस्तक मेला - 2016 : क्या है साहित्यकारों की अपेक्षाएँ
नई दिल्ली के प्रगति मैदान में हर वर्ष आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले का 23 वां आयोजन 9 से 16 जनवरी, 2016 तक होने जा रहा है। इस वर्ष विश्व पुस्तक मेले की खास बात यह है कि दुनिया भर से 18 देश अपने प्रकाशकों के साथ इसमें प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस मेले से लोगों की बहुत अपेक्षाएँ हैं। इसी क्रम में गाजियाबाद से प्रकाशित जागरूकता मेल ने तमाम साहित्यकारों-ब्लोगर्स की राय प्रकाशित की। इसमें भारत की सबसे कम उम्र की राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता एवं नन्ही ब्लॉगर अक्षिता (पाखी ) के विचार भी प्रकाशित हैं। आप भी पढ़ें -
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में बच्चों हेतु ज्यादा पुस्तकों के साथ-साथ एक किड कार्नर भी होना चाहिए, जहाँ बच्चे खेल-खेल में कुछ सीख सकें। बच्चों के साथ बाल साहित्यकारों का संवाद कार्यक्रम भी आयोजित किया जाना चाहिए। पुस्तक मेल सिर्फ प्रदर्शनी का माध्यम ही नहीं बने, बल्कि यहाँ से समाज को सन्देश भी देने की जरूरत है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी थीम पर प्रधानमन्त्री मोदी जी ने अच्छी पहल की है। इस विषय पर पुस्तकों और कार्यक्रम का भी विश्व पुस्तक मेला में आयोजन हो।
- अक्षिता (पाखी),
राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता
कक्षा-3, जोधपुर, राजस्थान।
शुक्रवार, जनवरी 01, 2016
शनिवार, नवंबर 28, 2015
मम्मी-पापा की शादी की सालगिरह
आज मम्मी-पापा की शादी की सालगिरह पर ढेर सारी शुभकामनाएँ और प्यार !!
Happy Marriage Anniversary to our sweet Mummy-Papa (#KrishnaKumarYadav with #AkankshaYadav). May God bless them to go ahead with all Happiness and Success in life.
लेबल:
पापा की बातें,
ममा की बातें,
स्पेशल-डे
मंगलवार, नवंबर 10, 2015
इको-फ्रेंडली दीपावली की खुशियाँ
दीपावली का त्यौहार फिर से आ गया। इस बार हम यह त्यौहार जोधपुर में सेलिब्रेट करेंगे। वैसे भी, दीपावली का इंतजार हमें कई दिनों से रहता है। इस दिन ढेर सारे दीये जलाना बहुत अच्छा लगता है। फिर उन्हें घर के हर कोने में और बाहर लान में सजाकर लगाना कित्ता सुन्दर लगता है। ऐसे लगता है जैसे धरती पर ढेर सारे तारे चमक रहे हों। और हाँ, लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा करके उन्हें भोग चढ़ाना और फिर ढेर सारी मिठाइयां और चॉकलेट्स खाने का तो आनंद ही कुछ और है।
एक बात और ..मुझे ढेर सारे पटाखे जलाने का बिलकुल मन नहीं करता है। एक तो इससे प्रदूषण फैलता है और इससे कित्ता शोर-शराबा होता है। यह हमारे हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है। हमारे स्कूल में भी इस बारे में बताया गया और हमने भी कई लोगों से प्रॉमिस लिया कि वे इस साल पटाखे नहीं जलाएंगे और इको-फ्रेंडली दीपावली मनाएंगे।
दीपावली रोशनी का त्यौहार है, न कि पटाखों का। इस मौके पर हम खूब दीये जलाएंगे और परिवार के साथ इसका आनंद उठाएंगे। पटाखों से तो बिलकुल दूर रहूँगी। पटाखों से निकली चिंगारी से तो कई बार लोगों की आँखों की रोशनी भी चली जाती है। इससे प्रदूषण भी बहुत फैलता है। ऐसे में मैंने संकल्प लिया है कि इस दीपावली पर पटाखों से दूर रहूँगी। जो पैसे हम पटाखों पर खर्च करते हैं, उनसे किसी गरीब या जरूरतमंद की सहायता कर उनके जीवन में रोशनी फैलाएंगे।
- अक्षिता (पाखी)
(राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता)
!! आप सभी को दीपावली पर्व पर सपरिवार शुभकामनाएँ !!
सोमवार, अक्टूबर 26, 2015
तुम जियो हजारों साल
हमारी प्यारी सिस्टर अपूर्वा 27 अक्टूबर को पूरे पाँच साल की हो जाएँगी। इनके हैप्पी बर्थ-डे पर आप सबका आशीष, स्नेह और प्यार तो मिलना ही चाहिये !!
अपूर्वा को जन्मदिन पर ढेर सारी बधाइयाँ और प्यार !!
Many-many Happy Returns of the day to our sweet sister Apurva.
Celebrating her Birthday on 27th October.
तुम जियो हजारों साल,साल के दिन हो पचास हजार
"May you live a thousand years and may each year have a fifty thousand days"
लेबल:
जोधपुर,
फन एंड मस्ती,
हैप्पी बर्थ-डे,
Apurva
गुरुवार, अक्टूबर 22, 2015
दशहरे पर रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के साथ ही सूर्पनखा और ताड़का के पुतलों का भी दहन
अब दशहरा को ही लीजिये। रोज जिद करके मम्मी-पापा से रामायण के पात्रों के बारे में जानना चाहती हूँ। अब तो इस पर बुक्स भी पढ़ रही हूँ। पर एक बात नहीं समझ में आती कि जब रावण के पुतले को जलाना ही है तो उस पर इतना पैसा और मेहनत क्यूँ खर्च किया जाता है। हर साल जलाते है और फिर अगले साल हाजिर। वह भी पिछले साल से बड़ा।
यहाँ जोधपुर में तो बरकतुल्लाह स्टेडियम के बगल में रावण का चबूतरा है, जहाँ हर साल दशहरे पर रावण को जलाया जाता है। संभवत: जोधपुर ही ऐसा शहर है, जहाँ दशहरे पर रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के साथ ही सूर्पनखा और ताड़का के पुतलों दहन किया जाता है। एक तरफ रावण और उसके परिजनों का पुतला जलाना और दूसरी तरफ जोधपुर में दवे गोधा समाज के लोग अपने आप को रावण का वंशज मानते हैं, इसलिए ये लोग रावण दहन को नहीं देखते। जोधपुर में हमें राम लीला देखने को नहीं मिली।
अधर्म पर धर्म की जीत
अन्याय पर न्याय की जीत
बुराई पर अच्छाई की जयजयकार
यही है दशहरा का त्यौहार
…… विजयदशमी पर्व पर आप सभी को सपरिवार शुभकामनाएँ !!
लेबल:
जोधपुर में,
फेस्टिवल-डे
बुधवार, अक्टूबर 21, 2015
नवरात्र और बेटियाँ ...
नवरात्र हर साल आता है। इस पर्व के बहाने बहुत सी बातें होती हैं, संकल्प उठाये जाते हैं। इन नौ दिनों में हम मातृ शक्ति की आराधना करते। नवरात्र मातृ-शक्ति और नारी-सशक्तिकरण का प्रतीक है। आदिशक्ति को पूजने वाले भारत में नारी को शक्तिपुंज के रूप में माना जाता है। नारी सृजन की प्रतीक है. हमारे यहाँ साहित्य और कला में नारी के 'कोमल' रूप की कल्पना की गई है. कभी उसे 'कनक-कामिनी' तो कभी 'अबला' कहकर उसके रूपों को प्रकट किया गया है. पर आज की नारी इससे आगे है. वह न तो सिर्फ 'कनक-कामिनी' है और न ही 'अबला', इससे परे वह दुष्टों की संहारिणी भी बनकर उभरी है. यह अलग बात है कि समाज उसके इस रूप को नहीं पचा पता. वह उसे घर की छुई-मुई के रूप में ही देखना चाहता है. बेटियाँ कितनी भी प्रगति कर लें, पुरुषवादी समाज को संतोष नहीं होता. उसकी हर सफलता और ख़ुशी बेटों की सफलता और सम्मान पर ही टिकी होती है. तभी तो आज भी गर्भवती स्त्रियों को ' बेटा हो' का ही आशीर्वाद दिया जाता है. पता नहीं यह स्त्री-शक्ति के प्रति पुरुष-सत्तात्मक समाज का भय है या दकियानूसी सोच.
नवरात्र पर देवियों की पूजा करने वाले समाज में यह अक्सर सुनने को मिलता है कि 'बेटा' न होने पर बहू की प्रताड़ना की गई. विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि बेटा-बेटी का पैदा होना पुरुष-शुक्राणु पर निर्भर करता है, न कि स्त्री के अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो बेटा या बेटी क़ी पैदाइश करती है. पर पुरुष-सत्तात्मक समाज अपनी कमजोरी छुपाने के लिए हमेशा सारा दोष स्त्रियों पर ही मढ़ देता है. ऐसे में सवाल उठाना वाजिब है क़ी आखिर आज भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से क्यों ग्रस्त है पुरुष मानसिकता ? कभी लड़कियों के जल्दी ब्याह क़ी बात, कभी उन्हें जींस-टॉप से दूर रहने क़ी सलाह, कभी रात्रि में बाहर न निकलने क़ी हिदायत, कभी सह-शिक्षा को दोष तो कभी मोबाईल या फेसबुक से दूर रहने क़ी सलाह....ऐसी एक नहीं हजार बिन-मांगी सलाहें हैं, जो समाज के आलमबरदार रोज सुनाते हैं. उन्हें दोष महिलाओं क़ी जीवन-शैली में दिखता है, वे यह स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं कि दोष समाज की मानसिकता में है.
'नवरात्र' के दौरान अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा रही है. लोग उन्हें ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छानते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ?
समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहाँ महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....??
(मम्मी के ब्लॉग से साभार। यह पोस्ट अच्छी लगी, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)
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